शनिवार, 29 अगस्त 2026

बालाघाट का 500 करोड़ी डबल मनी घोटाला, मास्टरमाइंड सोमेंद्र कंकराने 7 साथियों संग हरिद्वार से गिरफ्तार, तीन साल से था फरार

 

बालाघाट के बहुचर्चित डबल मनी घोटाले में मास्टरमाइंड सोमेंद्र कंकराने को 7 साथियों संग हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया गया है। 500 करोड़ से अधिक की धोखाधड़ी का ये मामला है। पुलिस मामले में तेजी से कार्रवाई कर रही है।

मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले का सबसे चर्चित और बड़ा 'डबल मनी घोटाला' एक बार फिर सुर्खियों में है। पुलिस ने इस पूरे सुनियोजित सट्टे और धोखाधड़ी के खेल के मुख्य सूत्रधार सोमेंद्र कंकराने को उसके सात अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार करने में बड़ी सफलता हासिल की है। यह पूरी कार्रवाई उत्तराखंड की धार्मिक नगरी हरिद्वार से की गई है, जहां ये सभी आरोपी पिछले तीन साल से अपनी पहचान छिपाकर फरारी काट रहे थे। मुख्य आरोपी सोमेंद्र कंकराने अदालत से भी फरार घोषित था और उसके खिलाफ स्थायी वारंट जारी हो चुका था। निवेशकों की गाढ़ी कमाई हड़पने वाले इस शातिर गिरोह के खिलाफ अनियमित जमा प्रतिबंध कानून के तहत 63 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक यह पूरा घोटाला 500 करोड़ रुपये से भी अधिक का है, जिसके कारण पुलिस और प्रशासन पर आरोपियों को दबोचने का भारी दबाव था।

साल 2022 में हुआ था भंडाफोड़, जमानत रद्द होते ही भागे

बालाघाट में इस फर्जी निवेश योजना का पर्दाफाश साल 2022 में हुआ था। उस दौरान पुलिस ने सख्त कदम उठाते हुए सोमेंद्र कंकराने समेत कई लोगों को हिरासत में लिया था। शुरुआती छापेमारी में पुलिस ने आरोपियों के ठिकानों से 13 करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी बरामद की थी। इसके साथ ही, जांच को आगे बढ़ाते हुए करीब 32 बैंक खातों में जमा 11 करोड़ रुपये की राशि को फ्रीज कर दिया गया था और आरोपियों की लगभग 45 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्तियों को कुर्क करने की बड़ी कार्रवाई की गई थी। पहली गिरफ्तारी के बाद सोमेंद्र को अदालत से सशर्त जमानत मिल गई थी, लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए बाद में माननीय उच्च न्यायालय ने उसकी बेल को खारिज कर दिया था। जमानत रद्द होने और ट्रायल कोर्ट में लगातार अनुपस्थित रहने के कारण निवेशकों के मामलों की कानूनी सुनवाई पूरी तरह ठप पड़ी थी, क्योंकि आरोपी अपने वकीलों के जरिए सिर्फ तारीखें आगे बढ़वा रहा था।

कम समय में पैसा दोगुना करने का लालच और सफेदपोशों का संरक्षण

इस डबल मनी स्कीम का शिकार सिर्फ बालाघाट ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों के लोग भी हुए थे। आम नागरिकों से लेकर सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, बड़े व्यापारियों और राजनेताओं ने भी कम समय में अमीर बनने के चक्कर में करोड़ों रुपये का निवेश कर दिया था। सोमेंद्र कंकराने ने शुरुआत में साख बनाने के लिए 8 से 9 महीने में पैसा दोगुना करके लौटाया, जिससे लोगों का भरोसा बढ़ गया। बाद में जब बाजार में कुछ और प्रतिद्वंद्वी आ गए और उन्होंने 2 से 3 महीने में ही पैसा डबल करने का दावा ठोक दिया, तो सोमेंद्र के धंधे में गिरावट आने लगी। इसके बाद उसने एजेंटों का एक नेटवर्क तैयार किया और निवेशकों को गारंटी के तौर पर ब्लैंक चेक देने शुरू कर दिए। जब पैसे वापस मिलने बंद हुए और सीएम हेल्पलाइन पर शिकायतों की बाढ़ आई, तब जाकर पुलिस ने इस रैकेट को ध्वस्त किया। तत्कालीन विधानसभा उपाध्यक्ष सुश्री हिना कावरे ने भी इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया था। चर्चा है कि इस मुख्य आरोपी को बचाने और उसकी पैरवी करने में कई रसूखदार और सफेदपोश लोग भी पर्दे के पीछे से शामिल थे, जिनकी शह पर वह फरार होने में कामयाब रहा था।

मास्टरमाइंड के साथ परिवार और मददगार भी आए शिकंजे में

पुलिस अधीक्षक आदित्य मिश्रा के कुशल मार्गदर्शन में टीम ने मुस्तैदी दिखाते हुए न सिर्फ सोमेंद्र को पकड़ा, बल्कि उसके साथ फरारी काट रहे पूरे कुनबे और मददगारों को दबोच लिया। गिरफ्तार किए गए अन्य आरोपियों में सोमेंद्र के परिजन और साथी शामिल हैं, जिनके नाम राकेश महेश्वरे, तामेश महेश्वरे, प्रदुम्मन कंकराने, दिनेश कंकराने, रामप्रसाद मनसुरे, प्रदीप कंकराने और रूपचंद घरडे हैं। इन सभी के खिलाफ अवैध रूप से वित्तीय योजनाएं चलाने के गंभीर आरोप हैं। पुलिस के अनुसार इस घोटाले से जुड़े दो अन्य प्रमुख आरोपी अजय तिडके और हेमराज आमाडारे पहले से ही जेल की सलाखों के पीछे हैं। सोमेंद्र की गिरफ्तारी के बाद अब न्यायालय में लंबित पड़े मुकदमों की सुनवाई में तेजी आएगी और पीड़ितों को जल्द न्याय मिलने की उम्मीद जगी है।

रिपोर्ट - शौकत बिसाने

साभार-इंडिया टीवी

 


ब्लैक विडो घोटाला: रूसी सैनिकों से फर्जी शादी कर मौत का मुआवजा हड़पने का खेल

 

यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस में एक चौंकाने वाला घोटाला सामने आ रहा है. कुछ महिलाओं पर आरोप है कि वे रूसी सेना में भर्ती होने वाले पुरुषों से जल्दबाजी में शादी कर लेती हैं. फिर जब वे सैनिक मोर्चे पर मारे जाते हैं तो उनकी मौत का सरकारी मुआवजा अपने नाम कर लेती हैं.

 

रूसी अधिकारी और मीडिया इन्हें ब्लैक विडो कहकर पुकार रहे हैं. यह घोटाला न सिर्फ सैनिकों के परिवारों को सदमे में डाल रहा है बल्कि समाज में गुस्से का माहौल भी पैदा कर रहा है. 

 

सेंट पीटर्सबर्ग में रहने वाली 37 वर्षीय मारिया का अनुभव इस घोटाले की तस्वीर साफ करता है. सैन्य अधिकारियों ने उन्हें बताया कि उनके 59 वर्षीय पिता यूरी मोर्चे पर गोली लगने से घायल हुए. बाद में मौत हो गई. मारिया को न तो पता था कि उनके पिता सेना में भर्ती हुए हैं. न ही यह कि उन्होंने सिर्फ दो दिन पहले शादी कर ली थी. 

दुल्हन उनके पिता से 22 साल छोटी थी. कानूनी रूप से अगली उत्तराधिकारी बन गई. मारिया कहती हैं कि मैं अब भी सदमे में हूं. पहले लगा जैसे सपना देख रही हूं. आज भी कभी-कभी लगता है कि यह सब सपना ही था, लेकिन यह सच है. उन्होंने उस महिला से कभी बात नहीं की और तुरंत शक किया कि यह घोटाला है. सीएनएन ने उस विधवा से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन जवाब नहीं मिला.

 

जब कोई रूसी सैनिक युद्ध में मारा जाता है तो उसके निकटतम परिजन को सैन्य मुआवजा मिलता है जो पांच लाख रूबल यानी करीब 64 हजार डॉलर से शुरू होता है. यह रकमभर्ती होने वाले सैनिकों को आश्वासन देने के लिए दी जाती है कि अगर सबसे बुरा हुआ तो उनके परिवार का ख्याल रखा जाएगा. लेकिन अब चिंता बढ़ रही है कि इस  सुविधा का दुरुपयोग हो रहा है.

 

हाल के महीनों में रूस में कई ऐसी कहानियां चर्चा में आईं जिनमें भर्ती होने वाले सैनिकों को शादी के जाल में फंसाया गया. कुछ मामलों में तो घायल सैनिकों से अस्पताल में मौत से पहले शादी कर ली गई. एक बड़े मामले में एक नर्स पर आरोप लगा कि उसने अपने देखभाल में आए पांच सैनिकों से शादी की ताकि उनकी मौत के मुआवजा ले सके. बाद में उसे नौकरी से निकाल दिया गया.

 

यह घोटाला रूसी समाज में गहरी नाराजगी पैदा कर रहा है. युद्ध को क्रेमलिन अब भी विशेष सैन्य अभियान कहता है लेकिन घरेलू मोर्चे पर इसकी कीमत साफ दिख रही है. अर्थव्यवस्था खराब हो रही है. ईंधन की कमी है. यूक्रेनी हमले रूसी धरती पर हो रहे हैं . ऐसे में ब्लैक विडो के खिलाफ आवाजें तेज हो रही हैं.

 

रूसी संसद के प्रभावशाली सांसद लियोनिद स्लुत्स्की ने कहा कि विशेष सैन्य अभियान में भाग लेने वाले परिवारों को बेशर्म अपराधियों, तथाकथित ब्लैक विडो, वित्तीय और टेलीफोन घोटालेबाजों से सुरक्षा की जरूरत है. उन्होंने कहा कि ऐसे अपराध अब गंभीर हो रहे हैं. इनकी संख्या भी बढ़ रही है.

 

सरकार की शादी को बढ़ावा देने वाली नीति

 

2022 में यूक्रेन पर बड़े पैमाने के आक्रमण के बाद क्रेमलिन ने भर्ती होने वाले सैनिकों को शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया. शायद परिवार का सहारा बढ़ाने या लड़ने की अतिरिक्त प्रेरणा देने के लिए. यह राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की पारंपरिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली नीति के भी अनुरूप था क्योंकि रूस में जनसंख्या घट रही है. 

अधिकारियों ने नए सैनिकों के लिए त्वरित शादी की व्यवस्था की जिसमें सामान्य नोटिस अवधि को हटा दिया गया. राज्य टेलीविजन पर स्थानीय अधिकारियों द्वारा आयोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम दिखाए गए. एक सैनिक से शादी करना, खासकर जो जल्द मोर्चे पर भेजा जाने वाला हो, संपत्ति खरीदने का रास्ता भी बन गया.

टॉम्स्क शहर में रियल एस्टेट एजेंट ने एक पॉडकास्ट में चौंकाने वाली सलाह दी. जब होस्ट ने पूछा कि 30 साल की महिला अपार्टमेंट कैसे खरीदे तो एजेंट मरीना ओरलोवा ने हंसते हुए कहा कि एक ऐसा पुरुष ढूंढो जो विशेष सैन्य अभियान में सेवा दे रहा हो. जब वह मारा जाएगा तो तुम्हें आठ लाख रूबल यानी करीब एक लाख दो हजार डॉलर मिल जाएंगे. कई महिलाएं आजकल सस्ते अपार्टमेंट ऐसे ही खरीद रही हैं. यह बिजनेस है. दोनों महिलाओं पर मुकदमा चला, उन्हें लंबी सामुदायिक सेवा की सजा मिली और सैनिकों तथा उनकी पत्नियों से माफी मांगनी पड़ी.

 

कुछ मामलों में अदालतों ने भी हस्तक्षेप किया. रियाज़ान के एक सैनिक जॉर्जी कोस्त्यर्को ने छुट्टी के दौरान एंजेलीना वर्युखिना से मुलाकात की और दस दिन बाद शादी कर ली. मां के अनुसार नई पत्नी जल्द ही दूसरे पुरुषों के साथ तस्वीरें डालने लगीं. बेटा तलाक के लिए आवेदन करने ही वाला था कि मारा गया. पत्नी को मुआवजा मिला. बाद में अदालत ने उसकी उत्तराधिकारी स्थिति रद्द कर दी लेकिन घोटाले ने व्यापक गुस्सा पैदा किया. कुछ मामलों में रूसी सुरक्षा बलों के सदस्य भी शामिल बताए गए. सुदूर पूर्व के प्रिमोर्स्की क्राय में वारंट ऑफिसर, सार्जेंट और सैन्य लेखाकार पर आरोप लगा कि उन्होंने अनाथ और बिना नजदीकी रिश्तेदार वाले कमजोर पुरुषों को भर्ती किया, उनकी शादी करवाई और फिर उन्हें खतरनाक मोर्चे पर भेज दिया जहां मरने की संभावना ज्यादा थी. मुआवजे में हिस्सा लेने का इरादा बताया गया. इस मामले में अभी सार्वजनिक अपडेट नहीं आए हैं.

 

साभार-आज तक

मुंबई पुलिस में ₹6.41 करोड़ का सैलरी घोटाला, कागजों पर थे 10 'घोस्ट कर्मचारी'; 6 साल बाद खुला राज

मुंबई पुलिस विभाग के पेरोल रिकॉर्ड में 6.41 करोड़ रुपये का बड़ा वित्तीय घोटाला सामने आया है। यहां उन 10 पुलिस कर्मचारियों के नाम पर सैलरी के तौर पर करोड़ों रुपये ट्रांसफर किए गए, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था।

2019 और 2020 के बीच मुंबई पुलिस के 'कर्मचारियों' को सैलरी के तौर पर लगभग 6.4 करोड़ रुपये दिए गए। इस मामले में अब छह साल बाद पता चला कि ये कर्मचारी सिर्फ कागजों पर ही मौजूद थे।

कैसे हुआ घोटाले का खुलासा?

पुलिस कर्मचारियों का डेटा पुराने सैलरी पोर्टल 'सेवार्थ' से जब नए सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म पर ट्रांसफर किया जा रहा था, तब ऐसे 10 नाम सामने आए, जिनके नाम पर सैलरी दी गई, लेकिन ये कर्मचारी सिर्फ कागजों पर ही मौजूद थे।

उत्तरी क्षेत्रीय डिवीजन के एक पुलिस अधिकारी की शिकायत के मुताबिक, दस ऐसे लोगों को बार-बार कर्मचारी के तौर पर लिस्ट किया गया जो पुलिसकर्मी नहीं थे और उनके बैंक खातों में हर महीने सैलरी जाती रही।

इन फर्जी पुलिसकर्मियों के बैंक खाते में ट्रांजैक्शन दिसंबर 2019 से फरवरी 2020 तक और जून 2020 से सितंबर 2020 के बीच किए गए।

FIR में बताए गए 10 फर्जी नाम ये हैं- रामदास भोगले, सुधाकर कदम, सरजू यादव, भागवत भोसले, गुनाजी खावकर, महादेव हलदानकर, राजेंद्र सोनार, उत्तम थोराट, सूर्यकांत पाटिल और पांडुरंग कदम।

पुलिस के अनुसार, मिनिस्ट्रियल लेवल के क्लर्कों ने मिलीभगत करके अटेंडेंस रजिस्टर और फर्जी कर्मचारियों (घोस्ट एम्प्लॉई) के रिकॉर्ड बनाए। इन पर बाहरी लोगों के नाम पेरोल में जोड़ने का आरोप लगा है।

फर्जी ट्रांजैक्शन करने के मामले में केस दर्ज

घटना के समय पद पर रहे पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। FIR में नामजद कर्मचारियों में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी रामकृष्ण गोस्वामी, नागेश तलवडेकर और विजया चव्हाण के साथ-साथ हेड क्लर्क अजय राठौड़ और सीनियर क्लर्क अमोल मेश्राम शामिल हैं।

इन सभी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी, विश्वासघात और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए गए हैं।

मुंबई पुलिस विभाग ने बिना मंजूरी के सैलरी प्रोसेस करने के लिए फर्जी सर्विस ID और डिफाइंड कंट्रीब्यूशन पेंशन स्कीम (DCPS) ID बनाने के आरोपों के बाद विजया चव्हाण और क्लर्क अमोल मेश्राम को सस्पेंड कर दिया है।

सस्पेंड किए गए कर्मचारियों को प्राइवेट नौकरी या व्यापार करने की भी इजाजत नहीं है। गुजारे के लिए भत्ता पाने के लिए उन्हें रेगुलर तौर पर जानकारी देनी होगी और बिना आधिकारिक मंजूरी के बृहन्मुंबई इलाके से बाहर जाने पर भी रोक लगा दी गई है।

इस मामले में अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी खोले गए बैंक अकाउंट्स को कौन कंट्रोल करता था।

साभार- जागरण 

रविवार, 23 मार्च 2025

कब-कब न्याय की कुर्सी पर लगे दाग: भारत में जजों पर भ्रष्टाचार के 5 बड़े मामले, जानिए यहां

 

जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला पिछले हफ्ते तब चर्चा में आया, जब उनके दिल्ली स्थित सरकारी बंगले में आग लग गई। सूत्रों के अनुसार, जस्टिस वर्मा उस समय शहर से बाहर थे, और उनके परिवार ने फायर ब्रिगेड को बुलाया. आग बुझाने के बाद दमकल कर्मियों को एक कमरे में भारी मात्रा में नकदी मिली.

भारत में 75 साल के इतिहास में कई ऐसे मौके आए हैं जब  न्यायपालिका पर  भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने की घटना ने एक बार फिर इस मुद्दे को सुर्खियों में ला दिया. आग बुझाने के दौरान फायर ब्रिगेड को उनके घर से भारी मात्रा में नकदी मिलने की खबर ने देश भर में हंगामा मचा दिया. इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा को उनके मूल कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने का फैसला लिया, और अब मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने उनके खिलाफ जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठन की है. यह पहला मौका नहीं है जब जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. आइए जानते हैं ऐसे कुछ 5 मामलों के बारे में जिसमें जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. 

  • पहला उदाहरण 2009 का है, जब पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के जज जस्टिस निर्मल यादव पर 15 लाख रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा. इस मामले में एक वकील ने दावा किया कि उसने गलती से रिश्वत की राशि गलत जज के घर भेज दी थी, जिसके बाद यह घोटाला उजागर हुआ.
  • मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिनाकरण पर तमिलनाडु में अवैध जमीन अर्जन और संपत्ति संचय के आरोप लगे. उनके खिलाफ 16 शिकायतें दर्ज की गईं, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनकी सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति रोक दी. जांच के दबाव में उन्होंने 2011 में इस्तीफा दे दिया था.
  • तीसरा उदाहरण 2017 का है, जब कलकत्ता हाई कोर्ट के जज जस्टिस सी.एस. कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के कई जजों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए. उनके खिलाफ अवमानना का मामला चला, और उन्हें छह महीने की जेल हुई. 
  • चौथा मामला 2018 का है, जब सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर मनमाने ढंग से केस बांटने और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में अभूतपूर्व घटना थी. 
  • पांचवां उदाहरण 2021 का है, जब बॉम्बे हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज पर रिश्वत लेकर फैसले देने के आरोप लगे, हालांकि यह मामला जांच के अभाव में ठंडे बस्ते में चला गया. 

जस्टिस वर्मा केस ने इन पुराने घावों को फिर से कुरेद दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायपालिका में जवाबदेही की कमी और पारदर्शिता का अभाव इन समस्याओं को बढ़ावा देता है. जजों के खिलाफ महाभियोग ही एकमात्र संवैधानिक उपाय है, लेकिन अब तक इसका सफल इस्तेमाल नहीं हुआ. 

जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला पिछले हफ्ते तब चर्चा में आया, जब उनके दिल्ली स्थित सरकारी बंगले में आग लग गई। सूत्रों के अनुसार, जस्टिस वर्मा उस समय शहर से बाहर थे, और उनके परिवार ने फायर ब्रिगेड को बुलाया. आग बुझाने के बाद दमकल कर्मियों को एक कमरे में भारी मात्रा में नकदी मिली.

'अधजली नोटों की गड्डियां मेरी नहीं...'
न्यायाधीश यशवंत वर्मा का कहना है कि जिस कमरे में नोटों की गड्डियां मिलीं, वह उनके मुख्य आवास से अलग है और कई लोग इसका इस्तेमाल करते हैं. दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय को नकदी की कथित बरामदगी पर एक लंबे जवाब में न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि 14 मार्च की देर रात होली के दिन दिल्ली में उनके आधिकारिक आवास के स्टाफ क्वार्टर के पास स्थित स्टोर रूम में आग लग गई थी. न्यायाधीश ने लिखा, 'इस कमरे का इस्तेमाल आम तौर पर सभी लोग पुराने फर्नीचर, बोतलें, क्रॉकरी, गद्दे, इस्तेमाल किए गए कालीन, पुराने स्पीकर, बागवानी के उपकरण और सीपीडब्ल्यूडी (केंद्रीय लोक निर्माण विभाग) की सामग्री जैसे सामान रखने के लिए करते थे. यह कमरा खुला है और सामने के गेट के साथ-साथ स्टाफ क्वार्टर के पिछले दरवाजे से भी इसमें प्रवेश किया जा सकता है. यह मुख्य आवास से अलग है और निश्चित रूप से मेरे घर का कमरा नहीं है, जैसा कि बताया जा रहा है.'

साभार- एनडीटीवी

समाज की बात Samaj Ki Baat 

कृष्णधर शर्मा 

 

रविवार, 9 फ़रवरी 2025

व्यापम: ढेर सारी संदिग्ध मौतों वाला भारत का परीक्षा घोटाला

 2013 में भारत के मध्य प्रदेश में भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा परीक्षा घोटाला यानी व्यवसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) सामने आया. परीक्षा में किसी की जगह दूसरे को बैठाना, नकल कराना और अन्य तरह की धांधलियों की वजह से इस मामले में हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार किया गया.  

हालांकि इन घटनाओं में एक चौंकाने वाला मोड़ तब सामने आया जब 2013 में घोटाला के सार्वजनिक होने से कई साल पहले, घोटाले से जुड़े संदिग्धों की एक के बाद एक मौत होने लगी. इन लोगों की मौत की वजहों में दिल का दौरा और सीने में दर्द से लेकर सड़क दुर्घटनाएं और आत्महत्याएं शामिल थीं. इतना ही नहीं, ये सभी मौतें असामयिक और रहस्यमयी थीं.

  भारत की केंद्रीय जांच एजेंसी, सीबीआई ने व्यापम घोटाले से संबंधित मौतों की जब जांच शुरू की तो सबसे पहला यही सवाल था कि ये मरने वाले लोग कौन थे और उनकी मौत कैसे हुई? कहीं इन मौतों में कोई स्पष्ट पैटर्न तो नहीं था? व्यापम घोटाले से जुड़े कई लोगों की मौत बीमारियों के कारण भी हुई है, इस रिपोर्ट में केवल उन लोगों को शामिल किया गया है जिनकी मृत्यु की परिस्थितियाँ संदेह पैदा करती हैं या परिजनों ने साज़िश की बात कही है.

इंदौर के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज की 19 साल की छात्रा नम्रता दामोर जनवरी, 2012 की एक सुबह लापता हो गईं. सात जनवरी, 2012 को उनका शव उज्जैन में रेलवे ट्रैक से बरामद किया गया.  

शुरुआती पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि उनकी मौत दम घुटने से हुई थी. इसके बाद उनकी मौत को हत्या के तौर पर दर्ज किया गया.  शुरुआती रिपोर्ट में उनके होठों पर चोट के निशान और कुछ दांतों के ग़ायब होने का उल्लेख भी था. हालांकि बाद में पुलिस ने शुरुआती आकलनों को खारिज़ कर दिया और दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद उनकी मौत को आत्महत्या के तौर पर दर्ज किया.  

इसके तीन साल बीतने के बाद एक प्रमुख मीडिया संस्थान के पत्रकार अक्षय सिंह नम्रता के पिता का इंटरव्यू लेने झाबुआ गए. इंटरव्यू रिकॉर्ड करने से पहले उन्हें खांसी होने लगी और मुंह से झाग़ बाहर निकलने लगा.

अक्षय सिंह मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले में मेहताब सिंह दामोर के घर पहुंचे थे. वे मेहताब सिंह की बेटी नम्रता दामोर की 2012 में हुई संदिग्ध मौत के बारे में बात करना चाहते थे. पिता मेहताब सिंह भी बात करने को तैयार थे. दोनों आमने-सामने बैठे थे. मेहताब सिंह ने अपनी याचिकाओं और कोर्ट के फ़ैसले की फोटोकॉपी सामने बैठे अक्षय सिंह को सौंपी. चाय आ गई थी. जैसे ही सिंह ने चाय पी, उनका चेहरा अकड़ने लगा और होठों पर झाग के साथ वे ज़मीन पर गिर गए.  

अक्षय सिंह को मेहताब सिंह दामोर के घर तक ले जाने वाले इंदौर के स्थानीय पत्रकार राहुल कारिया कहते हैं, "हमने उन्हें फ़र्श पर लिटाया, उनके कपड़े ढीले कर दिए और उनके चेहरे पर पानी छिड़का. मैं उनकी नब्ज़ देखी और मुझे तुरंत पता चला गया कि अक्षय सिंह की मौत हो चुकी है."  उन्हें सिविल अस्पताल और बाद में एक निजी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचाने में असफल रहे. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हुई थी और मौत के समय उनके दिल का आकार बढ़ा हुआ था.  

इसके एक दिन बाद, राज्य के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज के डीन जो व्यापम में शामिल छात्रों की सूची तैयार कर रहे थे, वे नई दिल्ली के एक होटल में मृत पाए गए.

शर्मा जबलपुर मेडिकल कॉलेज के डीन थे और और उन्होंने कथित तौर पर मध्य प्रदेश के स्पेशल टास्क फ़ोर्स के पास 200 से ज़्यादा दस्तावेज़ जमा कराए थे. उन्होंने खुद से उन छात्रों की सूची तैयार की थी जिन पर कथित तौर पर धांधली में शामिल होने का आरोप था.

अक्षय की मौत के एक दिन बाद, वे दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के नज़दीक स्थित होटल उप्पल में अपने बिस्तर पर मृत पाए गए थे.वे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की ओर से एक निगरानी के लिए त्रिपुरा की राजधानी अगरतला जा रहे थे. पुलिस को उनके कमरे से शराब की खाली बोतल मिली थी. ऐसा ज़ाहिर हो रहा था कि शर्मा ने रात में काफ़ी शराब पी थी और रात में उन्हें उल्टियां भी आई थीं.

मामले की जांच करने वाले अधिकारी ने प्राकृतिक कारण से होने वाली मौत बताते हुए जांच बंद कर दी थी. अचरज की बात यह थी कि वे मेडिकल कॉलेज के दूसरे डीन थे जिनकी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी. एक साल पहले जबलपुर मेडिकल कॉलेज के एक दूसरे डीन ने अपने घर के पीछे बगीचे में आत्महत्या कर ली थी.

डॉ. डीके जबलपुर मेडिकल कॉलेज के तत्कालीन डीन थे, साथ ही वे व्यापम की जांच कर रहे कॉलेज की आंतरिक जांच समिति के प्रभारी भी थे. सुबह 8.45 बजे जब उनकी पत्नी टहलने के बाहर गई हुई थीं, तब वे आग की लपटों के बीच अपने घर से बाहर निकले थे.  

पुलिस ने बाद में दावा किया कि ये आत्महत्या है और इसमें कुछ भी संदिग्ध नहीं है. हालांकि इस मामले को उजागर करने वाले कार्यकर्ताओं का दावा है कि ये आत्महत्या का मामला नहीं था और उन्होंने उनकी असमय मौत की केंद्रीय एजेंसियों से जांच कराने की मांग की थी.

नरेंद्र राजपूत झांसी कॉलेज में बैचलर ऑफ़ आयुर्वेदिक मेडिसीन एंड सर्जरी (बीएएमएस) से डिग्री हासिल करने के बाद अपने गांव हरपालपुर लौट गए थे. असामयिक मौत से महज छह महीने पहले उन्होंने अपने गांव में अपना क्लिनिक शुरू किया था.  

13 अप्रैल, 2014 को नरेंद्र ने खेतों में काम करने के दौरान छाती में दर्द की शिकायत की और घर की तरफ़ लौटने लगे लेकिन घर के दरवाज़े पर ही वे ढेर हो गए. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनकी मौत की स्पष्ट वजह का पता नहीं चला. उनके परिवार वालों ने सरकार की किसान बीमा योजना के तहत बीमा लाभ के लिए आवेदन किया, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजहों का पता नहीं चलने की वजह बीमा का लाभ भी परिवार वालों को नहीं मिला.  

नरेंद्र के रिश्तेदारों के मुताबिक मौत के कुछ महीनों के बाद पुलिस उनके घर पहुंची और तब जाकर परिवार वालों को पता चला था कि व्यापम घोटाले में बिचौलिए के तौर पर उन पर मामला दर्ज है.

सरकार के अनुमान के मुताबिक 2007 से 2015 के बीच व्यापम मामले से जुड़े 32 लोगों की मौत हुई. हालांकि स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस मामले में 40 से अधिक लोगों की मौत हुई थी. हमने उन मामलों को देखा है जिसे मीडिया ने प्रकाशित किया है और एसटीएफ़ और सीबीआई ने अपनी चार्ज़शीट में शामिल किया है.

साभार- बी बी सी एशिया 

भंडाफोड़  Bhandafod 


रविवार, 30 जून 2024

रांची के 25 साल पुराने बिटुमिन घोटाले में सीबीआई कोर्ट ने तीन इंजीनियरों को सुनाई सजा

 


रांची के बहुचर्चित बिटुमिन घोटाले के 25 साल पुराने केस में रांची की सीबीआई कोर्ट ने तीन इंजीनियरों को तीन-तीन साल के कारावास की सजा सुनाई है।

अदालत ने पाया कि इन इंजीनियरों ने फाइलों पर सड़कों का निर्माण और मरम्मत दिखाकर सरकारी राशि का गबन किया। जिन इंजीनियरों को सजा सुनाई गई है, उनमें जूनियर इंजीनियर विवेकानंद चौधरी, कुमार विजय शंकर (दोनों सेवानिवृत्त) एवं बिनोद कुमार मंडल शामिल हैं। 

कोर्ट ने इन पर 50-50 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है। यह केस झारखंड राज्य बनने के पहले का है। तत्कालीन बिहार सरकार के अंतर्गत आरईओ (रूरल इंजीनियरिंग ऑर्गनाइजेशन) के रांची वर्क्स डिविजन में वर्ष 1992-93 से लेकर 1997 तक सड़कों की मरम्मत के नाम पर घोटाला सामने आने पर सीबीआई ने छह दिसंबर 1999 को एफआईआर दर्ज कर तफ्तीश शुरू की। जांच पूरी करते हुए सीबीआई ने पांच आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की।


चार्जशीट के मुताबिक, आरोपियों ने 12 सड़कों की मरम्मत का कार्य फाइलों पर दिखाया और उसी के अनुसार बिटुमिन की मांग की। बताया गया कि मरम्मत में लगभग 1500 मीट्रिक टन बिटुमिन का इस्तेमाल किया गया, लेकिन स्टॉक रजिस्टर की जांच के बाद इस घोटाले का खुलासा हुआ। इस गबन को छिपाने के लिए आरोपियों ने एक फर्जी एकाउंट जनवरी 1997 में तैयार किया था। चार्जशीट के बाद मुकदमे में लंबा ट्रायल चला। आरोपियों में दो की मृत्यु ट्रायल के दौरान हो गई। गवाहों और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने शनिवार को तीन आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।

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रविवार, 12 नवंबर 2023

मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा करेगी 15 हजार करोड़ के घोटाले की जांच, FIR में 32 नाम

 

महादेव ऐप मामला मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा को सौंपा गया है. महादेव सट्टेबाजी कांड को अब EOW मुंबई साबित करेगी. इससे पहले माटुंगा पुलिस ने इस मामले में सौरभ चंद्राकर और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी. इसी प्रकार ऑनलाइन सट्टा चलाने वाले 32 लोगों के नाम एफआईआर में है. इस मामले में 15000 करोड़ के घोटाले का आरोप है.

 

इनपर केस दर्ज
मुंबई पुलिस ने 15,000 करोड़ रुपये के अवैध जुआ और साइबर धोखाधड़ी से संबंधित मामले में महादेव सट्टेबाजी ऐप के प्रमोटरों-सौरभ चंद्राकर, रवि उप्पल और शुभम सोनी- और 29 अन्य पर मामला दर्ज किया है. पुलिस ने मजिस्ट्रेट अदालत के निर्देश पर ये प्राथमिकी दर्ज की है. पुलिस ने मामले में साइबर आतंकवाद से जुड़ी धाराएं भी लगाई हैं. महादेव ऐप के प्रमोटर, जो मूल रूप से भिलाई, छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं, ने हाल ही में एक बयान में दावा किया था कि उन्होंने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को 500 करोड़ रुपये से अधिक दिए हैं.

 

छत्तीसगढ़ पुलिस की जांच में क्या निकला?
पीटीआई के अनुसार महादेव ऐप की जांच छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा की गई है, जिसमें अब तक 72 मामले दर्ज किए गए हैं और 449 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इसके अलावा, कथित घोटाले से जुड़े लोगों से 191 लैपटॉप, 865 मोबाइल फोन और 1.50 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति और बैंक खातों में 16 करोड़ रुपये जब्त किए गए हैं. उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में दर्ज मामलों पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जांच शुरू की है.

 

रायपुर पुलिस की साइबर सेल ने 12 अक्टूबर, 2022 को Google को पत्र लिखकर महादेव ऐप को ब्लॉक करने की मांग की थी, जिसके बाद सर्च इंजन दिग्गज ने एप्लिकेशन को हटा दिया. छत्तीसगढ़ पुलिस की जांच में पता चला कि महादेव ऐप के संचालक रवि उप्पल और सौरभ चंद्राकर (वर्तमान में दुबई में) हैं. इसके बाद, पुलिस ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया.

Source : ABP Live

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

425 करोड़ के घोटाले के सुबूत ले गई सीबीआई

 

425 करोड़ के खाद्यान्न घोटाले की जांच करने आई सीबीआई टीम ने दो दिनों तक बैंक खातों की पड़ताल के साथ कोटेदारों के बयान दर्ज किए हैं। सीबीआई टीम ने बुधवार को इटियाथोक के कोटेदारों से पूछताछ की। साथ ही दो दर्जन से अधिक राशन कार्डों की पड़ताल की है। जिला पूर्ति अधिकारी से घोटाले से जुड़े अभिलेख भी तलब किए हैं। पड़ताल के बाद घोटाले के सुबूत हासिल कर सीबीआई टीम लखनऊ रवाना हो गई।


खाद्यान्न घोटाले में सीबीआई टीम ने मंडी और कोटेदारों के बैंक खातों की जानकारी भी हासिल की है। जिससे यह पता चल सके कि घोटाले का खेल कैसे हुआ। दरअसल खाद्यान्न का उठान के लिए कोटेदारों को अपने खातों से बैंकर्स चेक देना होता था, अक्सर एक ही व्यक्ति कई कोटेदारों का बैंकर्स चेक गोदाम पर जमाकर उठान करते थे। यहीं से घोटाले का खेल शुरू हुआ था।


जिले में वर्ष 2004 से 2006 के बीच खाद्यान्न घोटाला हुआ था। शासन की जांच में 425 करोड़ के खाद्यान्न घोटाले की रिपोर्ट सामने आई थी। ईओडब्लू ने जांच की तो संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना तक ही सीमित रही। उस समय रोजगार योजना में श्रमिकों को काम के बदले अनाज भी मिलता था। बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर 2007 में सीबीआई ने जांच शुरू की।

17 थानों में दर्ज हुए थे 63 मुकदमें
मामले में 63 मुकदमे 17 थानों में दर्ज हुए थे। मामले में 300 से अधिक लोग अभी तक आरोपित किए जा चुके हैं। बुधवार को भी जिला आपूर्ति कार्यालय में सीबीआई टीम पहुंची। वहां पर टीम के अधिकारियों ने इटियाथोक के लोगों के बयान दर्ज किए।

सीबीआई की टीम ने मध्यनगर के तत्कालीन कोटेदार राणा प्रताप सिंह व बेलभरिया गांव के प्रेम प्रकाश गुप्ता के बयान दर्ज किए। राशन कार्ड के साथ कोटेदारों के अभिलेखों की पड़ताल की है। सीबीआई को कुछ और अभिलेख की जरूरत है। जिसकी सूची जिला पूर्ति अधिकारी को दी है, उनसे अभिलेख मांगे गए हैं।
आपूर्ति विभाग सीबीआई मुख्यालय को अभिलेख उपलब्ध कराएगा। टीम अभी फिर जिले में आएगी। माना जा रहा है कि सीबीआई घोटाले की जड़ तक जाने की कोशिश कर रही है और खाद्यान्न माफिया के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में हैं।

बिना काम कराए ही हुआ था फर्जी भुगतान
खाद्यान्न घोटाले की शुरुआती जांच में 63 मामले ऐसे सामने आए थे, जिसमें बिना काम कराए ही फर्जी भुगतान किए गए और अनाज का वितरण दिखाया गया। थानों में मुकदमे दर्ज हुए और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष समेत कई ब्लॉक प्रमुख और बीडीओ के विरुद्ध मुकदमे दर्ज हुए।
गिरफ्तारियां हुईं और फिर जांच सीबीआई को मिली। सीबीआई ने जांच शुरू की तो पता चला कि इसके अलावा उन वर्षों में गरीबों को कोटे के माध्यम से दिए जाने के राशन में भी घोटाले की बात सामने आई। सीबीआई राशन वितरण में गड़बड़ी की भी जांच कर रही है।

 

स्रोत - अमर उजाला

 

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

एक और बड़े घोटाले के विवाद में घिरी केजरीवाल सरकार, CBI ने मामला दर्ज कर शुरू की जांच

 

दिल्ली सरकार एक बार फिर से विवादों में घिर गई है। दिल्ली सरकार के वन और वन्‍य जीव (फारेस्ट और वाइल्ड लाइफ) विभाग में 223 करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया है। इस मामले में CBI ने जांच शुरु कर दी है। सीबीआई ने वन और वन्यजीव यानी फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ विभाग , दिल्ली सरकार द्वारा बैंक ऑफ बड़ौदा में सावधि जमा के रूप में 223 करोड़ के निवेश में कथित जालसाजी और धोखाधड़ी की जांच के लिए मामला दर्ज किया है। CBI ने बैंक ऑफ बड़ौदा के बैंक के सीनियर ब्रांच मैनेजर एलए खान समेत फारेस्ट और वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट दिल्ली सरकार के अज्ञात अफसर और बैंक ऑफ बड़ोदा के अज्ञात अफसरों के खिलाफ आईपीसी की धारा 120बी, 409, 420, 467, 468, 471 और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 13(2) 13(1)(a) के तहत मामला दर्ज किया है।

फर्जी अकाउंट में ट्रांस्फर होता था पैसा

खुफिया सूत्रों से CBI को पता लगा कि दिल्ली सरकार के फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ विभाग की तरफ से बैंक ऑफ बड़ौदा की पहाड़गंज ब्रांच को 223 करोड़ रुपए का सरप्लस फंड रिज मैनेजमेंट बोर्ड फंड के नाम से एफडीआर्स में इन्वेस्ट करने के नाम पर जारी किया। बैंक के सीनियर ब्रांच मैनेजर एल ए खान ने 223 करोड़ रुपए बैंक ऑफ बड़ौदा पहाड़गंज की ब्रांच में एकांउन्ट नंबर 00980100028204 दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड DUSIB के नाम पर ट्रांसफर किया जो कि एक फर्जी एकांउन्ट था। जानकारी को वैरिफाई किया गया तो पता चला कि दिल्ली सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेस्ट एंड वाइल्ड लाइफ ने फिक्स डिपॉजिट स्किम जिसे रिज मैनेजमेंट बोर्ड फंड के नाम से 223 करोड़ रुपए का फंड एप्रूव किया और एक साल बाद बैंक ऑफ बड़ौदा पहाड़गंज ब्रांच से SBI आईपी एक्सटेंशन में ट्रांसफर कर लिया गया। 

बैंक के अज्ञात अफसरों के खिलाफ मामला दर्ज

जांच में पता चला कि बैंक ऑफ बड़ौदा के सीनियर बैंक मैनेजर एल ए खान ने डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ के अज्ञात अफसरों के साथ मिलकर गलत तरीके से फर्जी लेटर्स के सहारे 223 करोड़ रुपए sundry एकांउन्ट बैंक ऑफ बड़ौदा से सेविंग एकांउन्ट में ट्रांसफर किए और दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड का एकांउन्ट भी फर्जी पाया गया। साथ ही बैंक मैनेजर एल ए खान ने रिज मैनेजमेंट बोर्ड के नाम से फर्जी FDR स्कीम के लैटर फारेस्ट और वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट को जारी कर दिए। जांच के बाद सीबीआई ने बैंक ऑफ बड़ौदा पहाड़गंज ब्रांच के सीनियर ब्रांच मैनेजर एल ए खान, डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ और बैंक ऑफ बडौदा बैंक के अज्ञात अफसरों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।


स्रोत - इंडिया टीवी