शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

425 करोड़ के घोटाले के सुबूत ले गई सीबीआई

 

425 करोड़ के खाद्यान्न घोटाले की जांच करने आई सीबीआई टीम ने दो दिनों तक बैंक खातों की पड़ताल के साथ कोटेदारों के बयान दर्ज किए हैं। सीबीआई टीम ने बुधवार को इटियाथोक के कोटेदारों से पूछताछ की। साथ ही दो दर्जन से अधिक राशन कार्डों की पड़ताल की है। जिला पूर्ति अधिकारी से घोटाले से जुड़े अभिलेख भी तलब किए हैं। पड़ताल के बाद घोटाले के सुबूत हासिल कर सीबीआई टीम लखनऊ रवाना हो गई।


खाद्यान्न घोटाले में सीबीआई टीम ने मंडी और कोटेदारों के बैंक खातों की जानकारी भी हासिल की है। जिससे यह पता चल सके कि घोटाले का खेल कैसे हुआ। दरअसल खाद्यान्न का उठान के लिए कोटेदारों को अपने खातों से बैंकर्स चेक देना होता था, अक्सर एक ही व्यक्ति कई कोटेदारों का बैंकर्स चेक गोदाम पर जमाकर उठान करते थे। यहीं से घोटाले का खेल शुरू हुआ था।


जिले में वर्ष 2004 से 2006 के बीच खाद्यान्न घोटाला हुआ था। शासन की जांच में 425 करोड़ के खाद्यान्न घोटाले की रिपोर्ट सामने आई थी। ईओडब्लू ने जांच की तो संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना तक ही सीमित रही। उस समय रोजगार योजना में श्रमिकों को काम के बदले अनाज भी मिलता था। बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर 2007 में सीबीआई ने जांच शुरू की।

17 थानों में दर्ज हुए थे 63 मुकदमें
मामले में 63 मुकदमे 17 थानों में दर्ज हुए थे। मामले में 300 से अधिक लोग अभी तक आरोपित किए जा चुके हैं। बुधवार को भी जिला आपूर्ति कार्यालय में सीबीआई टीम पहुंची। वहां पर टीम के अधिकारियों ने इटियाथोक के लोगों के बयान दर्ज किए।

सीबीआई की टीम ने मध्यनगर के तत्कालीन कोटेदार राणा प्रताप सिंह व बेलभरिया गांव के प्रेम प्रकाश गुप्ता के बयान दर्ज किए। राशन कार्ड के साथ कोटेदारों के अभिलेखों की पड़ताल की है। सीबीआई को कुछ और अभिलेख की जरूरत है। जिसकी सूची जिला पूर्ति अधिकारी को दी है, उनसे अभिलेख मांगे गए हैं।
आपूर्ति विभाग सीबीआई मुख्यालय को अभिलेख उपलब्ध कराएगा। टीम अभी फिर जिले में आएगी। माना जा रहा है कि सीबीआई घोटाले की जड़ तक जाने की कोशिश कर रही है और खाद्यान्न माफिया के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी में हैं।

बिना काम कराए ही हुआ था फर्जी भुगतान
खाद्यान्न घोटाले की शुरुआती जांच में 63 मामले ऐसे सामने आए थे, जिसमें बिना काम कराए ही फर्जी भुगतान किए गए और अनाज का वितरण दिखाया गया। थानों में मुकदमे दर्ज हुए और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष समेत कई ब्लॉक प्रमुख और बीडीओ के विरुद्ध मुकदमे दर्ज हुए।
गिरफ्तारियां हुईं और फिर जांच सीबीआई को मिली। सीबीआई ने जांच शुरू की तो पता चला कि इसके अलावा उन वर्षों में गरीबों को कोटे के माध्यम से दिए जाने के राशन में भी घोटाले की बात सामने आई। सीबीआई राशन वितरण में गड़बड़ी की भी जांच कर रही है।

 

स्रोत - अमर उजाला

 

शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

एक और बड़े घोटाले के विवाद में घिरी केजरीवाल सरकार, CBI ने मामला दर्ज कर शुरू की जांच

 

दिल्ली सरकार एक बार फिर से विवादों में घिर गई है। दिल्ली सरकार के वन और वन्‍य जीव (फारेस्ट और वाइल्ड लाइफ) विभाग में 223 करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया है। इस मामले में CBI ने जांच शुरु कर दी है। सीबीआई ने वन और वन्यजीव यानी फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ विभाग , दिल्ली सरकार द्वारा बैंक ऑफ बड़ौदा में सावधि जमा के रूप में 223 करोड़ के निवेश में कथित जालसाजी और धोखाधड़ी की जांच के लिए मामला दर्ज किया है। CBI ने बैंक ऑफ बड़ौदा के बैंक के सीनियर ब्रांच मैनेजर एलए खान समेत फारेस्ट और वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट दिल्ली सरकार के अज्ञात अफसर और बैंक ऑफ बड़ोदा के अज्ञात अफसरों के खिलाफ आईपीसी की धारा 120बी, 409, 420, 467, 468, 471 और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 13(2) 13(1)(a) के तहत मामला दर्ज किया है।

फर्जी अकाउंट में ट्रांस्फर होता था पैसा

खुफिया सूत्रों से CBI को पता लगा कि दिल्ली सरकार के फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ विभाग की तरफ से बैंक ऑफ बड़ौदा की पहाड़गंज ब्रांच को 223 करोड़ रुपए का सरप्लस फंड रिज मैनेजमेंट बोर्ड फंड के नाम से एफडीआर्स में इन्वेस्ट करने के नाम पर जारी किया। बैंक के सीनियर ब्रांच मैनेजर एल ए खान ने 223 करोड़ रुपए बैंक ऑफ बड़ौदा पहाड़गंज की ब्रांच में एकांउन्ट नंबर 00980100028204 दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड DUSIB के नाम पर ट्रांसफर किया जो कि एक फर्जी एकांउन्ट था। जानकारी को वैरिफाई किया गया तो पता चला कि दिल्ली सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेस्ट एंड वाइल्ड लाइफ ने फिक्स डिपॉजिट स्किम जिसे रिज मैनेजमेंट बोर्ड फंड के नाम से 223 करोड़ रुपए का फंड एप्रूव किया और एक साल बाद बैंक ऑफ बड़ौदा पहाड़गंज ब्रांच से SBI आईपी एक्सटेंशन में ट्रांसफर कर लिया गया। 

बैंक के अज्ञात अफसरों के खिलाफ मामला दर्ज

जांच में पता चला कि बैंक ऑफ बड़ौदा के सीनियर बैंक मैनेजर एल ए खान ने डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ के अज्ञात अफसरों के साथ मिलकर गलत तरीके से फर्जी लेटर्स के सहारे 223 करोड़ रुपए sundry एकांउन्ट बैंक ऑफ बड़ौदा से सेविंग एकांउन्ट में ट्रांसफर किए और दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड का एकांउन्ट भी फर्जी पाया गया। साथ ही बैंक मैनेजर एल ए खान ने रिज मैनेजमेंट बोर्ड के नाम से फर्जी FDR स्कीम के लैटर फारेस्ट और वाइल्ड लाइफ डिपार्टमेंट को जारी कर दिए। जांच के बाद सीबीआई ने बैंक ऑफ बड़ौदा पहाड़गंज ब्रांच के सीनियर ब्रांच मैनेजर एल ए खान, डिपार्टमेंट ऑफ फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ और बैंक ऑफ बडौदा बैंक के अज्ञात अफसरों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।


स्रोत - इंडिया टीवी 

 

रविवार, 5 दिसंबर 2021

2100 करोड़ की वैट चोरी घोटाले को उजागर करने वाले अधिकारी को PM नरेंद्र मोदी ने दी जन्मदिन की बधाई

 

पीएम नरेंद्र मोदी ने ई-मेल से आबकारी अधिकारी को ग्रिटिंग कार्ड भेजा है. पीएम ने लिखा- प्रिय जीडी ठाकुर आपको जन्मदिन की शुभकामनाएं, यह वर्ष आपके जीवन में और अधिक खुशियां और सफलता लेकर आए. आबकारी एवं कराधान विभाग में कार्यरत अधिकारी जीडी ठाकुर देश में सबसे बड़े टैक्स चोरी में से एक केस समेत कई घोटालों का पर्दाफाश कर चुके हैं. जीडी ठाकुर चंबा जिले की डलहौजी तहसील के डूका गांव के रहने वाले हैं.

हिमाचल प्रदेश के आबकारी एवं कराधान विभाग (Excise and Taxation Department) में कार्यरत अधिकारी जीडी ठाकुर (GD Thakur) का 50वां जन्मदिन बेहद खास रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने जीडी ठाकुर को जन्मदिन की बधाई दी है. ठाकुर उत्कृष्ट कार्यों के लिए जाने जाते हैं. देश में सबसे बड़े वैट चोरी के मामले (VAT evasion Case) समेत कई घोटालों का पर्दाफाश कर चुके जीडी ठाकुर इस समय सोलन जिले के परवाणु में आबकारी एवं कराधान विभाग के साउथ जोन में ज्वाइन कमिश्नर के पद पर तैनात हैं और जीएसटी का कार्य देख रहे हैं.

जीडी ठाकुर चंबा जिले की डलहौजी तहसील के डूका गांव के रहने वाले हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ई-मेल के जरिए जीडी ठाकुर को बधाई दी और ग्रिटिंग कार्ड भेजा है. पीएम ने ग्रिटिंग कार्ड में लिखा है,”प्रिय जीडी ठाकुर, आपको जन्मदिन की बधाई, यह वर्ष आपके जीवन में और अधिक खुशियां और सफलता लेकर आए.” पीएम का ये ई-मेल जीडी ठाकुर को उनकी पर्सनल ई-मेल आईडी पर बुधवार सुबह 11 बजकर 21 मिनट पर आया. जीडी ठाकुर ने शुभकामनाओं के लिए पीएम का आभार जताया है.

 

2100 करोड़ रुपये का वैट चोरी घोटाला किया था उजागर

बता दें कि हिमाचल में इंडियन टैक्नोमैक कंपनी द्वारा किए गए 2100 करोड़ रू. के वैट चोरी के घोटाले का पर्दाफाश जीडी ठाकुर ने किया था, जैसे जैसे जांच आगे बढ़ी तो ये घोटाला 6 हजार करोड़ को पार कर चुका है. बैट चोरी का ये देश का सबसे बड़ा मामला था, इसके अलावा भी कई घोटालों का पर्दाफाश कर चुके हैं. इंडियन टैक्नोमैक कंपनी मामले पर इन्होंने सीआईडी में एफआईआर करवाई, मामले की जांच ईडी और सीबीआई भी कर रही है, इस जांच में जुटे कुछ अधिकारियों को राष्ट्रपति मैडल समेत कई अवॉर्ड मिले हैं.

12 साल प्राइवेट जॉब करने के बाद आए सरकारी सर्विस में 

1 दिसंबर 1971 को जन्मे जीडी ठाकुर ने पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और 12 साल प्राइवेट सेक्टर में नौकरी की. जीडी ठाकुर ने हैदराबाद स्थित नालसर यूविवर्सिटी ऑफ लॉ से साइबर क्राइम में पीजी डिप्लोमा किया है. प्रारंभिक पढ़ाई डलहौजी तहसील के तहत सरकारी स्कूल नैनीखड में हुई. साल 2002 में शिमला में आबकारी एवं कराधान विभाग के इंस्पेक्टर के रूप में सरकारी सेवा में आए. 2003 में लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर ईटीओ बने.

स्रोत - न्यूज़ 18 

 

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

210 करोड़ के नलकूप बिल घोटाले से जुड़े अहम साक्ष्य गायब

 

जिले में 210 करोड़ के नलकूप बिल घोटाले से जुड़े अहम दस्तावेज गायब हैं। एमडी कार्यालय से हापुड़ कार्यालय पहुंची टीम को जांच में तीन वर्षों का पूरा रिकॉर्ड ही नहीं मिला है, सिर्फ 22 लेजर ही टीम को मिले हैं। इससे जांच की गुत्थी फिर उलझ गई है, दो दशक से चल रही जांच में अभी भी निगम के हाथ खाली हैं, जिसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
वर्ष 2002 से 2004 तक निगम में नलकूप किसानों का बिजली बिल मैनुअल जमा किया जाता था। तत्कालीन अधिकारी, कर्मचारियों ने इसका लाभ उठाकर किसानों से रुपये ले लिए लेकिन बिल राजस्व कोष में जमा नहीं किया, जो रसीदें काटी गई उन्हें जला दिया गया। मामले का खुलासा हुआ तो लिपिक समेत कई कर्मचारियों को जेल हुई, अधिकारियों के तबादले हुए, एफआईआर भी दर्ज हुई। इस घोटाले की जांच ईडी समेत कई जांच एजेंसियां कर चुकी हैं। लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला है।

 

एमडी कार्यालय से अब मामले की जांच कराई जा रही है, वहां की टीम ने दो दिन तक हापुड़ में रिकॉर्ड खंगाला। लेकिन मुख्य दस्तावेज गायब मिले, बिलों को संशोधित करने या घोटाले की परत खोलने की दृष्टि से गायब हुआ रिकॉर्ड अहम माना जा रहा है। टीम को जो 22 लेजर मिले हैं उनसे जांच में कितना सहयोग मिलेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।

1500 से अधिक किसानों को भेज रहे गलत बिल
नलकूप बिलों में करोड़ों के घपलेबाजी से किसानों के बिलों में लाखों रुपये की गलत बकायेदारी जुड़कर आ रही है। पूरा बिल जमा करने के बावजूद किसानों को इससे निजात नहीं मिल रही है। घपले के शिकार हुए किसानों के बिलों की बकायेदारी चक्रवर्ती ब्याज के साथ लगातार बढ़ रही है, पूरा बिल जमा होने के बावजूद उनके बिल पांच लाख से अधिक रुपये के बनाए जा रहे हैं।

तत्कालीन डीएम के हस्तक्षेप के बाद शुरू हुई थी जांच
नलकूप बिल घोटाले की जांच वर्ष 2003 से ही चल रही है, लेकिन अभी तक कोई खुलासा नहीं हुआ है। तत्कालीन डीएम अदिति सिंह ने वर्ष 2019 में शासन को पत्र भेजकर, मामले से अवगत कराया। जिस पर एमडी कार्यालय से टीम गठित हुई। यह टीम करीब सात बार हापुड़ में रिकॉर्ड खंगाल चुकी है।
जांच का चल रहा अंतिम चरण
अफसरों का कहना है कि जांच का अंतिम चरण है, किसानों से उनके बिल की मूल कॉपी भी जमा कराई जा रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि कब तक इस घपले का निर्णय होगा। दोषियों से वसूली होगी या नहीं, किसानों के बिल खत्म होंगे या नहीं।
ऑनलाइन जमा नहीं कर सकते बिल
घोटाले के शिकार किसान ऑनलाइन बिल जमा नहीं कर सकते हैं। उनके बिलों का अभी भी मैनुअल ही जोड़ा जाता है। इसी के अनुसार उन्हें ओटीएस का लाभ मिलता है, जबकि पुराने सरचार्ज माफी पर कोई रियायत नहीं मिलती।
इन मामलों में हुई विद्युत निगम की किरकिरी
* गढ़ डिवीजन में फर्जी रसीदों से 60 लाख का घोटाला, मामले में एफआईआर दर्ज हुई।
* उबारपुर बिजलीघर के अवर अभियंता ने पैसे लेकर हाईटेंशन लाइन शिफ्ट की, लाखों का खेल, जेई का सिर्फ तबादला हुआ।
* हापुड़ में मीटर से छेड़छाड़ कर गलत वसूली के मामले में तत्कालीन एसई, एक्सईएन, एसडीओ, जेई के तबादले।
* मीटर में लाखों की रीडिंग स्टोर के मामले में एफआईआर।
* दो बिजलीघरों को जोड़ने वाली लाइन गलत तरीके से शिफ्ट, जांच जारी।
* पिलखुवा में रिश्वत लेने पर जेई निलंबित।
बिल जमा, फिर भी लाखों के बकायेदार
नलकूप का बिल लगातार जमा कर रहे हैं, लेकिन निगम में हुए घोटाले के बाद से उनके बिलों में लाखों की बकायेदारी जुड़कर आ रही है। सालों से बिलों को सही कराने के लिए चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन राहत नहीं मिल रही है।--दया रामपाल, कुचेसर चौपला।--फोटो संख्या--32
ऑॅनलाइन जमा नहीं होता बिल
बिलों में गड़बड़ी के चलते ऑनलाइन बिल जमा नहीं कर पाते हैं। बिल ठीक कराने के लिए पहले दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते हैं और फिर लाइन में लगकर बिल जमा कराना पड़ता है। गलती अधिकारियों ने की है और भुगतनी किसानों को पड़ रही है। - संतुशरण त्यागी

घोटाले की चल रही जांच
नलकूप बिल घपले की जांच एमडी कार्यालय से चल रही है। किसानों के बिलों का रिकॉर्ड भेजा जा रहा है। जल्द ही किसानों को इस तरह के बिलों से निजात मिल जाएगी।--यूके सिंह, अधीक्षण अभियंता।

स्रोत - अमर उजाला 


शुक्रवार, 8 मई 2020

7500 करोड़ के बैंक घोटाले के आरोपी रोटोमैक कंपनी के निदेशक की जमानत नामंजूर

 

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 7500 करोड़ रुपये के बैंक घोटाले के आरोपी रोटोमैक कंपनी के निदेशक राहुल कोठारी ,सहयोगी फ्रॉस्ट इंटरनेशनल के निदेशक सुजॉय देसाई और उदय देसाई को अंतरिम जमानत देने से इंकार कर दिया है। तीनों को 19 मार्च 20 को दिल्ली, मुंबई से गिरफ्तार किया गया था। इन्होंने जानलेवा कोरोना वायरस के प्रकोप एवं अपनी टाइप दो डायबटीज व अस्थमा बीमारी व अन्य आधार पर तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दिए जाने की मांग को लेकर हाइकोर्ट में ऑन लाइन अर्जी दाखिल की थी।कोर्ट ने दोनो पक्षों की बहस सुनने के बाद फैसला सुरक्षित कर लिया था।

कोर्ट ने जेल प्राधिकारी को याचियो की संक्रमण से सुरक्षा इंतजाम करने का भी निर्देश दिया है। अभी ये कानपुर जेल मे बंद हैं। न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए अर्जी खारिज कर दी है।

केंद्र सरकार की ऒर से सहायक सॉलिसिटर जनरल ज्ञान प्रकाश ने ई मेल से जवाब दाखिल कर जमानत अर्जी का विरोध किया। ज्ञान प्रकाश के मुताबिक तीनों पर 14 राष्ट्रीय बैंको से 4000 और 3500 करोड़ रुपये की बैंक देनदारी है। इन्होंने गलत दस्तावेजों के आधार पर बैंकों से करोड़ों रुपए का लोन लेकर के घोटाला किया है ।रोटोमेक कंपनी के खिलाफ इससे पूर्व सीबीआई भी इलाहाबाद बैंक से 36 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में मुकदमा दर्ज कर चुकी है। इसके अलावा बैंक ऑफ बड़ौदा से 456 करोड़ों रुपये और फ्रॉस्ट इंटरनेशनल द्वारा 3592 करोड़ो की लोन धोखाधड़ी करने का आरोप है। इनके खिलाफ सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस द्वारा कार्रवाई की जा रही है ।कोरोना वायरस संक्रमण और लॉक डाउन के आधार पर राहुल कोठारी ने अपनी तबीयत का हवाला देते हुए अंतरिम जमानत पर रिहा करने की मांग की है।कोर्ट ने सी बी आई को यथा शीघ्र जांच पूरी करने का निर्देश दिया है।

स्रोत – अमर उजाला

सोमवार, 25 नवंबर 2019

हजार करोड़ के बैंक घोटाले का आरोपी शंकर खंडेलवाल गिरफ्तार

 

बिहार में 233 करोड़ का एक और ‘ट्रेजरी महाघोटाला’ उजागर होने पर पक्ष-विपक्ष की सियासत गरमा गई है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव व जीतनराम मांझी ने मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार पर सीधा हमला बोला है। अपने ट्वीट में तेजस्‍वी ने कहा कि सृजन घोटाला की तरह इस घाटाला में भी 'घोटाला बाबू' की संलिप्‍तता है।

विदित हो कि सीएजी की ऑडिट में बिहार के मुजफ्फरपुर व दरभंगा के जिला नजारत कार्यालय में 233 करोड़ की वित्तीय अनियमितता के दो मामले पकड़े गए हैं। सीएजी रिपोर्ट के अनुसार ये घोटाले वर्ष 2009 से लेकर 2017 तक के बीच के हैं। इसका खुलासा सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में हुआ है

तेजस्‍वी का ट्वीट
इस घोटाले का जिक्र करते हुए तेजस्‍वी यादव ने ट्वीट किया है कि बिहार में 233 करोड़ का एक और घोटाला हो गया। सभी जिलों की ऑडिट रिपोर्ट आने पर हो सकता है कि यह अब तक का सबसे बड़ा घोटाला हो। इसमें सृजन घोटाले जैसे 35 अन्य घोटालों की तरह “घोटाला बाबू” इसमें भी सम्मिलित हैं।

 ट्वीट के अलावा मीडिया से बातचीत में भी तेजस्‍वी यादव ने तंज कसा कि बिहार में घोटालों की बहार है, क्‍योंकि यहां नीतीश कुमार हैं।


मांझी बोले: नीतीश के संरक्षण में हुआ घोटाला
महागठबंधन के घटक दल हिंदुस्‍तानी अवाम मोर्चा के सुप्रीमो व पूर्व मुख्‍यमंत्री जीतनराम मांझी ने कहा कि यह घोटाला मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार के संरक्षण में हुआ है। इसमें नीतीश कुमार के लोगों की संलिप्‍तता रही है।


मंत्री ने दी सफाई तो जदयू का पलटवार
घोटाला उजागर होने के बाद बैकफुट पर आई सरकार के मंत्री ने सफाई दी तो जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने जवाबी हमला किया।

राज्‍य सरकार में मंत्री सुरेश शर्मा ने कहा कि यह देखना पड़ेगा कि कैसा घोटाला है। जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी। सुरेश शर्मा बिहार सरकार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) कोटे से मंत्री हैं।
उधर, जदयू प्रवक्‍ता अजय आलोक ने  तेजस्‍वी पर पलटवार किया कि जो भ्रष्‍टाचार में पैदा हुआ और पला-बढ़ा, वह किस मुंह से घोटाले की बात कह रहा है। तेजस्‍वी के लिए कहा कि वे तो हमारे (जदयू) टुकड़ों पर उपमुख्‍यमंत्री बन गए थे।

स्रोत – जागरण

बुधवार, 24 जुलाई 2019

प्रवर्तन निदेशालय ने लॉटरी घोटाले में 119 करोड़ रुपये की संपत्तियां कुर्क कीं


प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) कथित रूप से एक लॉटरी घोटाले में अपनी मनी लांड्रिंग जांच के सिलसिले में 119 करोड़ रुपये की संपत्तियां कुर्क की हैं। इस लॉटरी घोटाले में सिक्किम सरकार को चूना लगाया गया है। 

ईडी ने लॉटरी क्षेत्र के दिग्गज सांतियागो मार्टिन और उनके सहयोगियों के खिलाफ धन शोधन रोधक कानून (पीएमएलए) के तहत यह शुरुआती आदेश दिया है।। ईडी ने तमिलनाडु के कोयम्बटूर जिले में 88 प्लॉट और 61 फ्लैट कुर्क करने का आदेश दिया है। ईडी ने बयान में कहा है कि कुर्क संपत्तियों का कुल मूल्य 119.6 करोड़ रुपये बैठता है। 

प्रवर्तन निदेशालय ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की प्राथमिकी और आरोपपत्र के आधार पर मार्टिन और उनकी कंपनी फ्यूचर गेमिंग सॉल्यूशंस (अब फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज) के खिलाफ आपराधिक मामला दायर किया था। ईडी ने कहा कि मार्टिन और अन्य ने आपराधिक साजिश रचकर लॉटरी नियमन कानून, 1998 के प्रावधानों का उल्लंघन किया और गलत तरीके से फायदा लेकर सिक्किम सरकार के साथ धोखाधड़ी की। 

मार्टिन का परिचालन सिक्किम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में है। ईडी का आरोप है कि मार्टिन की कंपनी और सरकारी अधिकारियों ने बिक्री से प्राप्त राशि सिक्किम सरकार के सार्वजनिक खाते में नहीं डाली अैर गैरकानूनी तरीके से फायदा लिया। उन्होंने सिक्किम राज्य की लॉटरियों की बिक्री केरल में भी की।

स्रोत - नवभारत टाईम्स 


रविवार, 24 दिसंबर 2017

2जी घोटाला अगर हुआ ही नहीं, तो इन सवालों के जवाब कौन देगा?

इससे पहले कि 2जी घोटाला खबर बनती, देश की प्रमुख जांच एजेंसियां नामी-गिरामी गुनाहगारों को रिहाई दिलाने की कला में माहिर हो चुकी थीं. देश में घोटालों के सुखद अंत की भी परंपरा रही है.
इसके बावजूद बोफोर्स और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटालों से इतर 2जी घोटाले ने देश में नीति निर्माण के तरीकों को झकझोड़ते हुए टेलिकॉम बाजार को पूरी तरह बदल दिया. वहीं 2जी मामले में दूसरा अपवाद है कि तथाकथित घोटाले की जांच कर रही सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय पूरी तरह से सरकारी मंत्रालयों से सामंजस्य रखते हुए उनके निर्देश पर काम कर रही थीं. लिहाजा, केन्द्र सरकार का भ्रष्टाचार के लिए जीरो टॉलरेंस का दावा यहां कोई मायने नहीं रखती.   
हालिया इतिहास में 2जी घोटाला संभवत: पहला मौका है जब अदालत को यह कहने में कोई गुरेज नहीं था कि अभियोजन पक्ष को यह नहीं पता था कि क्या साबित किया जाना है. लिहाजा जांच की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल के साथ-साथ यह तय है कि पूरी कोशिश दिशाहीन रही. वहीं हकीकत यह भी है कि 2जी मामले ने न सिर्फ राजनीतिक भूचाल लाने का काम किया बल्कि देश में टेलिकॉम क्रांति कि दिशा को भी पलटने का काम किया है.
यह पहला मौका है कि किसी कोर्ट को कहना पड़ा,'सभी आम धारणा पर चल रहे थे, अफवाह सच्चाई पर हावी थी. कोर्ट में किसी भी आरोप को साबित करने के लिए कोई साक्ष्य तक पेश नहीं किया गया.' वहीं सच्चाई यह भी है कि इन्हीं आरोपों के चलते सुप्रीम कोर्ट ने आवंटित किए जा चुके 122 टेलिकॉम लाइसेंस को निरस्त करने का फैसला सुनाया. लेकिन सीबीआई ने पांच साल तक कोशिश करने के बाद भी एक आरोप को साबित करने के लिए भी पर्याप्त सुबूत एकत्र नहीं किया.
लिहाजा कुछ गंभीर सवाल...यदि यह घोटाला नहीं होता...
1. जिन निवेशकों ने 2012 में लाइसेंस गंवाया उनके नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है? नेता और अधिकारी क्लीनचिट पा चुके हैं. लिहाजा अब इंडस्ट्री को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा? उन कर्मचारियों की भरपाई कौन करेगा जिन्होंने लाइसेंस रद्द होने के बाद अपनी नौकरी गंवा दी? हकीकत यही है कि 2जी के झटके से सुस्त पड़ा टेलिकॉम सेक्टर अभी तक अपनी रफ्तार नहीं पकड़ पाया है.
2. वैश्विक स्तर पर निवेश के ठिकाने के तौर पर भारत की स्थिति को 2जी घोटाले ने बुरी तरह प्रभावित किया है. इस घोटाले के बाद किसी भी मल्टीनैशनल टेलिकॉम कंपनी ने भारत का रुख नहीं किया है. जिन्होंने किया था वह 2012 में अपना लाइसेंस गवां बैठे और कभी न लौटने के लिए यहां से चले गए. लिहाजा, इसकी जिम्मेदारी किसके सर मढ़ी जाएगी?
3. इस पूरे विवाद में किसे फायदा पहुंचा? 2008 से पहले देश के टेलिकॉम सेक्टर में कुछ चुनिंदा कंपनियां थीं. लेकिन 2जी आवंटन ने सेक्टर में प्रतियोगिता का माहौल पैदा किया जिसके बाद देश में कॉल दरें लगातार कम होने की दिशा में आगे बढ़ीं. लेकिन 2012 में लाइसेंस रद्द होने के बाद सेक्टर में तीन से चार कंपनियां बचीं और टेलिकॉम सेक्टर का अधिकांश काम इन्हीं कंपनियों के पास सीमित हो गया. लिहाजा, प्रतियोगिता को खत्म करने के लिए कौन जिम्मेदार है?
4. इस 2जी घोटाले ने केन्द्र सरकार को स्पेक्ट्रम की नीलामी के जरिए अपना राजस्व बढ़ाने का मौका दिया. हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं कि नीलामी प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है लेकिन इससे स्पेक्ट्रम की कीमतों में इजाफा हुआ और टेलिकॉम कंपनियों की जेब पर यह भारी पड़ने लगा. कंपनियों ने इस कीमत को तो वहन किया लेकिन बदलती टेक्नोलॉजी में वह अपने नेटवर्क को मजबूत करने का खर्च करने में विफल हो गईं. इसका नतीजा यह हुआ कि तेज गति और नए जेनरेशन के स्पेक्ट्रम के बावजूद देश में टेलिकॉम सर्विस खराब होने लगी. लिहाजा, बीते कुछ वर्षों में महंगी और घटिया टेलिकॉम सर्विस के लिए कौन जिम्मेदार है?
केन्द्र सरकार ने हाल ही में मंत्रियों का समूह का गठन किया है जिसे कर्ज में डूबी हुई टेलिकॉम कंपनियों को उबारने का काम करना है. भारतीय टेलिकॉम कंपनियों पर 4.85 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और यह कर्ज देश के बैंकों के लिए बड़ी चुनौती है. इसके अलावा टेलिकॉम कंपनियों को लगभग 3 लाख करोड़ रुपये आवंटित स्पेक्ट्रम के मद में केन्द्र सरकार को अदा करना है. लिहाजा, इन सवालों के साथ एक सवाल और पूछा जाना चाहिए. घोटाले में किसे फायदा हुआ यह सब पूछ रहे हैं लेकिन पूछा यह भी जाना चाहिए कि घोटाले से किसे फायदा पहुंचा?

साभार -अंशुमान तिवारी (आज तक)

11 बड़े घोटाले, जो लाए देश की राजनीति में भूचाल

 चारा घोटाले में शनिवार को अदालत ने अपने फैसला सुनाते हुए आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव समेत 16 लोगों को दोष करार दे दिया है। हालांकि ये पहला घोटाला नहीं है, जिसमें किसी राजनेता या कोई बड़ी हस्ती का नाम आया हो और उसे सजा मिली हो। आजादी के बाद से अबतक लगभग 40 घोटाले एेसे हुए, जिसने देश-दुनिया में तहलका मचा दिया। आइए हम आपको एेसे ही 11 बड़े घोटालों के बारे में बताते हैं, जिसने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया।
 
जीप घोटाला (1948)
देश में घोटाले आजादी के बाद से ही शुरू हो गए थे। इसकी शुरुआत जीप घोटाले से हुई। यह देश में होने वाला पहला घोटाला था। आजादी के बाद भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से 2000 जीपों को सौदा किया था। सौदा 80 लाख रुपए का था लेकिन इसमें केवल 155 जीप ही मिल पाई। घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त वीके कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई थी लेकिन 1955 में केस बंद कर दिया गया।
 
मारुति घोटाला (1974) 
इस घोटाले में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम आया था। इस घोटाले का खुलासा 1974 में हुआ था। मारुति कंपनी बनने से पहले यहां एक घोटाला हुआ था। इस मामले में पैसेंजर कार बनाने का लाइसेंस देने के लिए संजय गांधी की मदद की गई थी।
 
बोफोर्स घोटाला (1987)
1986 में स्वीडन की ए बी बोफोर्स कंपनी से 155 तोपें खरीदने का सौदा तय किया गया। कहा गया कि इस सौदे को पाने के लिए 64 करोड़ रुपये की दलाली दी गई थी। इसमें स्वीडन की एक कंपनी बोफोर्स एबी से रिश्वत लेने के मामले में राजीव गांधी और ओटावियो क्वात्रोची  का नाम सामने आया था।
 
स्टॉक मार्केट (1992 व 2002)
स्टॉक माक्रेट में 10 साल के अंतराल में दो बड़े घोटाले हुए थे। पहला साल 1992 में हर्षद मेहता ने धोखाधाड़ी से बैंकों का पैसा स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, जिससे स्टॉक मार्केट को करीब 5000 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। इसके स्टॉक ब्रोकर केतन पारीख ने स्टॉक मार्केट में 1,15,000 करोड़ रुपए का घोटाला किया। दिसंबर, 2002 में इन्हें गिरफ्तार किया गया।
 

यूरिया घोटाला (1996)
इस मामले में 26 मई, 1996 को 133 करोड़ रुपए घपले का मामला दर्ज हुआ था।नेशनल फर्टिलाइजर के एमडी सीएस रामकृष्णन ने कई अन्य व्यापारियों, जो कि नरसिम्हाराव के नजदीकी थे, के साथ मिलकर दो लाख टन यूरिया आयात करने के मामले में सरकार को 133 करोड़ रुपए का चूना लगाया। यह यूरिया कभी भारत तक पहुंच ही नहीं पाई। इसमें किसी को सजा नहीं हुई।
 

चारा घोटाला (1996)
साल 1996 में बिहार में हुआ यह उस समय का सबसे बड़ा घोटाला था। चारा घाटाले ने देश में सनसनी फैला दी थी, क्योंकि यह एेसा घोटाला था, जो एक-दो करोड़ रुपए से शुरू होकर अब 900 करोड़ रुपए तक जा पहुंचा है। इस घपले के सूत्रधार बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे। आज इस चर्चित घोटाले में लालू यादव समेत कई लोगों को दोषी करार दिया गया है और 3 जनवरी को उन्हें सुनाई जाएगी।
 
आदर्श घोटाला (2002)
आदर्श कोऑपरेटिव सोसाइटी ने गैर कानूनी तरीके से कोलाबा के आवासीय क्षेत्र नेवी नगर और रक्षा प्रतिष्ठान के आसपास इमारत का निर्माण किया। इस घोटाले का आरम्भ फरवरी 2002 में हुआ। यह योजना कारगिल युद्ध में शहीद हुए लोगों के परिवार वालों के लिए बनाई गई थी, जबकि इसके फ्लैट्स 80 फीसदी असैनिक नागरिकों को आवंटित किए गए। इस घोटाले में तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण नाम आने से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। 
 
स्टांप घोटाला (1995)
यह घोटाला भारत में हुए अब तक के घोटालों में कुछ न अलग और नया था। इसमें अब्दुल करीम तेलगी ने स्टांप की हेरा फेरी कर देश को 20 हजार करोड़ रुपए का चूना लगाया था। 1995 में तेलगी के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए गए लेकिन गिरफ़्तारी 2001 में ही हो सकी।
 
सत्यम घोटाला (2009)
सत्यम घोटाला कॉरपोरेट जगत में अबतक का सबसे बड़ा घोटाला बना, जो 7 जनवरी 2009 को सामने आया था। देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी सत्यम कंप्यूटर सर्विस ने रियल इस्टेट और शेयर मार्केट के जरिए देश को लगभग 14 हजार करोड़ की चपत लगाई। कंपनी के चेयरमैन रामालिंगा राजू ने लोगों को काफी समय तक अंधेरे में रखा और शेयर के सारे पैसे हजम कर लिए।
 
कॉमनवेल्थ घोटाला (2008)
इस घोटाले में खेल के नाम पर जमकर लूट-खसोट की गई थी। घोटाले के सूत्रधार आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी और उनके सहयोगी रहे। 2008 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों के लिए राजधानी दिल्ली में आयोजन से विकासकार्य कराए, जिसमें जमकर बंदरबांट किया गया। इसमें करीब 70 हजार करोड़ का घपला सामने आया था।
 
2G घोटाला (2011)
2जी स्पेक्ट्रम घोटाला भारत का एक बहुत बड़ा घोटाला है। यह साल 2011 की शुरुआत के दौरान प्रकाश में आया था। 1.76 लाख करोड़ के इस चर्चित घोटाले ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी। इस घोटाले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा पर गाज गिरी। हालांकि सीबीआई की एक विशेष अदालत ने 21 दिसंबर 2017 को घोटाले के सभी आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया है।

साभार- पंजाब केशरी

शनिवार, 29 जुलाई 2017

ग्रेट व्यापमं स्कैम: घोटाले से बड़े हो रहे मौतों के रहस्य

 

व्यापमं महाघोटाले के एक और आरोपी प्रवीन यादव ने बुधवार को आत्महत्या कर ली। अब तक इस मामले में कई मौतें हो चुकी हैं और कई आत्महत्याएं। व्यापमं घोटाला मध्यप्रदेश से जुड़ा प्रवेश एवं भर्ती घोटाला है। मध्यप्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल अथवा व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल) सरकार द्वारा गठित स्व-वित्त पोषित एवं स्वायत्त निकाय है। यह निकाय राज्य में कई प्रवेश परीक्षाओं का संचालन करता है। ये प्रवेश परीक्षाएं शैक्षिक संस्थानों तथा सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए आयोजित की जाती हैं। इन प्रवेश परीक्षाओं  तथा नौकरियों में अपात्र उम्मीदवारों को बिचौलियों की मिलीभगत से प्रवेश दिया गया और बड़े पैमाने पर अयोग्य लोगों की भॢतयां की गईं। मामला उजागर होने के बाद अब तक 2000 के करीब गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। इस केस में 49 के करीब मौतें हो चुकी हैं, जिनमें से कई मौतों को संदिग्ध परिस्थितियों में हुईं माना जाता है। यह घोटाले से भी बड़ा मौतों का रहस्य बनता जा रहा है।  

जगदीश सागर के रैकेट के जरिए होता था सारा घोटाला       
2013 में व्यापमं घोटाले की व्यापकता सामने आने और 20 नकली अभ्यॢथयों की गिरफ्तारी के बाद जगदीश सागर का नाम घोटाले के मुखिया के रूप में सामने आया जो एक संगठित रैकेट के माध्यम से इस घोटाले को अंजाम दे रहा था। जगदीश सागर की गिरफ्तारी के बाद राज्य सरकार ने 26 अगस्त, 2013 को एस.टी.एफ. की स्थापना की। जांच और गिरफ्तारियों से कई नेताओं, नौकरशाहों, व्यापमं अधिकारियों, बिचौलियों, उम्मीदवारों और उनके माता-पिता की घोटाले में भागीदारी का पर्दाफाश हुआ। जून, 2015 तक 2000 से अधिक लोगों को इस घोटाले के सिलसिले में गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनमें राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा और 100 से ज्यादा राजनेता भी शामिल हैं। 

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बचाने का आरोप, मामला खारिज
2014 में प्रशांत पांडे जिन्हें एस.टी.एफ. द्वारा आई.टी. सलाहकार के रूप में रखा गया था, को व्यापमं अभियुक्त को ब्लैकमेल करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बाद में पांडे ने कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह से संपर्क किया और उसे इस घोटाले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की संदिग्ध भूमिका उजागर करने के कारण प्रताडि़त करने का आरोप लगाया। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने शपथपत्र के माध्यम से जांचकत्र्ताओं पर मुख्यमंत्री को बचाने का आरोप लगाया। एस.टी.एफ. ने सिंह की शिकायत का संज्ञान लिया और फोरैंसिक विश्लेषण के लिए एक्सैल शीट के दोनों संस्करणों को फोरैंसिक प्रयोगशाला भेज दिया। फोरैंसिक प्रयोगशाला की रिपोर्ट के आधार पर सिंह द्वारा प्रस्तुत वाद को उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति खानवलकर ने खारिज कर दिया।

घोटाले से जुड़े लोगों की मौतें
इस घोटाले से जुड़े कई लोगोंं की जांच के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है। 2015 में विशेष कार्य बल (एस.टी.एफ.) ने घोटाले से जुड़े लोगों की मौत को अप्राकृतिक मानते हुए 23 मृतकों की सूची उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की और बताया कि अधिकांश की मौत जुलाई, 2013 में एस.टी.एफ. के गठन से पहले हो गई है। कुछ मीडिया रिपोट्र्स का दावा है कि घोटाले से जुड़े 49 से अधिक लोगों की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हुई है। मुखबिर आनंद राय के अनुसार इन मौतों में से 10 संदेहास्पद मौतें हैं जबकि अन्य को उन्होंने संयोग माना। उसके द्वारा संदिग्ध के रूप में होने वाली मौतों में अक्षय सिंह, नम्रता डामोर, नरेंद्र तोमर, डी.के. साकल्ले,  अरुण शर्मा, राजेंद्र आर्य की मौत हो चुकी है और 4 बिचौलियों की सड़क दुर्घटनाओं में हुई मौतें शामिल हैं। एस.टी.एफ. के अनुसार घोटाले में शामिल 25-30 वर्ष आयुवर्ग के 32 लोगों की 2012 से अब तक संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है।

आरोपों में फंसे व्यापमं कर्मचारी पंकज त्रिवेदी, व्यापमं परीक्षा नियंत्रक
त्रिवेदी को सितंबर 2013 में गिरफ्तार किया गया। राज्य प्तकी भ्रष्टाचार निरोधक पुलिस ने उसके कब्जे से करीब 2.5 करोड़ रुपए और अज्ञात स्रोतों से जमा की गई बेनामी सम्पत्तियां जब्त कीं जो उसकी आय से कई गुना अधिक हैं। इंदौर स्थित एक मैडीकल कालेज में भी उसकी भागीदारी होने के साक्ष्य पाए गए हैं। जगदीश सागर के रैकेट का पर्दाफाश होने के बाद भी त्रिवेदी सागर के 317 उम्मीदवारों को शपथ पत्र प्रस्तुत करने पर मैडीकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने के लिए अनुमति देने संबंधी आदेश प्राप्त करने में कामयाब रहा। अन्य कर्मचारी सी.के. मिश्रा (अधिकारी व्यापमं), नितिन महेन्द्रा (प्रधान सिस्टम विश्लेषक) और अजय सेन (वरिष्ठ सिस्टम विश्लेषक), डा. जी.एस. खनूजा, मोहित चौधरी, नरेन्द्र देव आजाद (जाटव), डा. विनोद भंडारी, अनिमेष आकाश सिंह और जितेंद्र मालवीय।

डा.सागर के अलावा रैकेट के मुख्य सूत्रधार
व्यापमं घोटाले में कई संगठित रैकेट शामिल हैं जिन्हें पी.एम.टी. घोटाले के सूत्रधार के रूप में वॢणत किया गया है। ये गिरोह डा. जगदीश सागर, डा. संजीव शिल्पकार और संजय गुप्ता आदि के नेतृत्व में काम करते थे। पी.एम.टी. 2013 के लिए डा. सागर ने 317, शिल्पकार ने 92 और संजय गुप्ता ने 48 अयोग्य उम्मीदवारों के नाम प्रवेश हेतु दिए थे। नितिन महेन्द्रा ने अपने कम्प्यूटर में इन उम्मीदवारों का विवरण दर्ज किया और बाद में इस सूची को नष्ट कर दिया था। इन उम्मीदवारों को रोल नंबर आबंटित करते समय उनके आसपास के स्लॉट्स खाली छोड़ दिए गए। ये रोल नंबर बाद में नकली उम्मीदवारों को आबंटित कर दिए गए। इन रोल नंबर्स का निर्धारण महेन्द्रा के घर पर किया जाता था और पैन ड्राइव के माध्यम से दफ्तर के कम्प्यूटर में फीड कर दिया जाता था। इसके बाद महेन्द्रा बिचौलियों को टैलीफोन के माध्यम से रोल नम्बर्स के संबंध में आवश्यक जानकारी उपलब्ध करवाता था।

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

चावल निर्यात में 1,000 करोड़ का घोटाला!

 

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) की ओर से की जा रही जांच के अनुसार 2 लाख मीट्रिक टन से अधिक बासमती चावल को पिछले साल दुबई में उतार लिया गया जबकि इसे ईरान के बंदर अब्बास ले जाना था। चावल की इस खेप की कीमत 1,000 करोड़ रुपए बताई गई है।

 

उन्होंने कहा कि इस मामले में हरियाणा और पंजाब के 25 से अधिक बड़े निर्यातक डीआरआई एवं दूसरी एजेंसियों की जांच के घेरे में है। सूत्रों ने कहा कि चावल गुजरात के कांडला बंदरगाह ले जाया जाता था। निर्यातक चावल का ईरान में निर्यात करने से जुड़ा पोत परिवहन संबंधित बिल जमा करते थे।

 

चावल की खेप को ईरान के तट तक ले जाने की बजाय जहाजों को उनके परिचालकों की मिलीभगत से दुबई की ओर मोड़ दिया जाता था। हैरान करने वाली बात यह है कि भारत में इन निर्यातकों को चावल के बदले में भुगतान ईरान से किया जाता था। आयातकों एवं बंदरगाह अधिकारियों ने कथित तौर पर स्वीकार किया कि उनको चावल की खेप मिलीं और इन्होंने इनके एवज में भुगतान भी किया।


खुफिया एजेंसियों को जो बात सबसे अधिक चिंता में डाल रही है, वो यह है कि वे यह नहीं जानतीं कि दुबई में उतारे गए चावल की खेप आखिरकार कहां गई? उनको संदेह है कि इसका इस्तेमाल आतंकवाद के लिए वित्तपोषण जैसी गैरकानूनी गतिविधियों में किया गया। (भाषा)

मंगलवार, 26 मई 2015

चंबल तक आई 'व्यापमं घोटाला संषर्ष समिति' की आंच

 

व्यापमं घोटाले के जिन्न् से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को घेरने की कोशिश सिर्फ कांग्रेस नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वं सेवक संघ से मुक्त प्रचारक और असंतुष्ट भी कर रहे हैंं। विरोध के लिए 'व्यापमं घोटाला संघर्ष समिति' बनाई है। इस समिति की आंच चंबल (भिंड) तक आ चुकी है।

सितंबर 2014 में पूर्व प्रचारक मनीष काले और अभय जैन ने भिंड में बैठक की है। यह बात अब इसलिए सामने आई चूंकि हाल में घोषित भाजपा कार्यकारिणी में उन नेताओं को स्थान दिए जाने की बात आ रही है, जो बैठक में शामिल हुए थे। भाजपा का असंतुष्ट खेमा इस मामले को राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार चौहान तक पहुंचाने की तैयारी में है।

शहर के लॉज में हुई थी बैठक

व्यापमं घोटाले को लेकर चलाए जा रहे अभियान से जोड़ने के लिए पूर्व प्रचारक मनीष काले और अभय जैन ने सितंबर माह में भिंड के एक लॉज में बैठक की थी। भाजपा सूत्रों का कहना है इस बैठक में भाजपा और संघ से जुड़े आधा दर्जन से ज्यादा लोग शामिल हुए थे। अब इन नेताओं को भाजपा की जिला कार्यकारिणी में बड़े पद से लेकर कार्यसमिति सदस्य तक की जिम्मेदारी देने की बात कही जा रही है। हकीकत का खुलासा आला नेतृत्व से शिकायत और उसकी जांच के बाद होगा।

संघर्ष समिति ने अब तक यह किया

व्यापमं घोटाला संघर्ष समिति ने भिंड सहित प्रदेश के कई जिलों में बैठकें की हैं। भोपाल में 15 सितंबर को सत्याग्रह किया। पूर्व प्रचारक मनीष काले कहते हैं वे भोपाल में सत्याग्रह कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ज्ञापन देना चाहते थे, लेकिन उन्हें गिरफ्तार करा लिया गया। तब उन्होंने 172 साथियों के साथ 1-2 मार्च को दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम संबोधित ज्ञापन दिया, जिसमें इस पूरे घोटाले में जांच और कार्रवाई की मांग की गई।

जन जागरण के लिए अभियान

- व्यापमं घोटाले के खिलाफ जन जागरण अभियान में प्रदेश के 23 जिलों में 1 लाख से ज्यादा पत्रक बांटे गए, जिनमें व्यापमं घोटाले से जुड़ी जानकारियां हैं।

- घोटाले के विरोध के लिए समर्थन जुटाने 23 जिलों में 25 हजार लोगों के बीच हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया।

- व्यापमं घोटाले की जिम्मेदारी तय करने के लिए मुख्यमंत्री को पोस्टकार्ड भेजे गए, जिसमें पूछा गया घोटाले का जिम्मेदार कौन है?

- ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने के लिए फेसबुक पर व्यापमं घोटाला संघर्ष समिति नाम से पेज बनाया गया है, जिसे 394 लोगों ने लाइक किया है।

इनका कहना है

व्यापमं घोटाले के विरोध में भिंड में भी बैठक की थी। भोपाल में मुख्यमंत्री को ज्ञापन देने गए थे। हमें गिरफ्तार करा लिया गया। हमारे पास विकल्प नहीं था तब हमें दिल्ली जाना पड़ा। दिल्ली में 172 साथियों के साथ जंतर मंतर पर धरना देकर राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन दिया। हमारा अभियान अभी बंद नहीं है।

मनीष काले, पूर्व प्रचारक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

विरोध अभी बंद नहीं

व्यापमं घोटाले के विरोध में भिंड में भी बैठक की थी और भी जगह की हैं। हम अभियान की आगे की रणनीति नहीं बता सकते। व्यापमं घोटाले का विरोध अभी बंद नहीं है।

अभय जैन, पूर्व प्रचारक, राष्ट्रीय स्वं सेवक संघ

कोई असंतुष्‍ट नहीं

व्यापमं घोटाले को लेकर संघर्ष समिति की बैठक में कौन शामिल हुआ इसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता है। भाजपा में कोई असंतुष्ट नहीं है। लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है।

संजीव कांकर, जिलाध्यक्ष, भाजपा भिंड

 

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

व्यापमं घोटाले में मप्र के राज्यपाल पर एफआइआर

 

मध्य प्रदेश के व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) घोटाले में एसटीएफ ने मंगलवार को राज्यपाल रामनरेश यादव सहित सात लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर ली। राज्यपाल पर तीन उम्मीदवारों को वनरक्षक भर्ती परीक्षा में फर्जी तरीके से पास कराने का आरोप है। सभी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम समेत अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। हाई कोर्ट ने राज्यपाल सहित अतिविशिष्ट लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए थे। एसटीएफ के डीएसपी डीएस बघेल ने एफआइआर दर्ज किए जाने की पुष्टि की है। बघेल के मुताबिक वनरक्षक भर्ती परीक्षा 2013 में गड़बडिय़ां करने वाले 87 अभ्यर्थियों सहित कुल 101 आरोपी बनाए गए हैं।

 

गिरफ्तारी के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी

संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत राज्यपाल रामनरेश यादव के खिलाफ चालान पेश करने के लिए एसटीएफ को केंद्र सरकार के मार्फत राष्ट्रपति की मंजूरी लेनी पड़ेगी। इस मुकादमे को दर्ज करने के बाद एफटीएफ सिर्फ राज्यपाल से पूछताछ कर अपनी विवेचना को आगे बढ़ा सकेगी। राज्यपाल रामनरेश यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज होने का उन्हें तकनीकी रूप से फायदा मिलेगा। पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता अजय मिश्रा का मानना है कि वैधानिक रूप से राज्यपाल तब तक पद पर बने रह सकते हैं जब तक कि उनके खिलाफ राष्ट्रपति अभियोजन की मंजूरी नहीं दे देते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जिन धाराओं में मामला दर्ज है वे सभी गैर-जमानती हैं, पर गिरफ्तारी के लिए भी राष्ट्रपति की मंजूरी लेनी पड़ेगी।

 

इस्तीफा या बर्खास्तगी में से होगा फैसला

सूत्रों का दावा है कि केंद्रीय गृह सचिव ने राजभवन के प्रमुख सचिव विनोद सेमवाल को फोन कर प्रदेश के राजनीतिक हालात, संवैधानिक स्थितियां और राज्यपाल रामनरेश यादव के खिलाफ दर्ज हुए आपराधिक मुकदमे का ब्योरा लिया। केंद्रीय गृह सचिव ने प्रमुख सचिव को यह भी समझाइश दी है कि वे राज्यपाल को इस्तीफा देने संबंधी केंद्र सरकार की सलाह दे दें। उधर, सूत्रों का यह भी कहना है कि नैतिकता के नाते पद ने छोडऩे पर केंद्र सरकार राज्यपाल को बर्खास्त तक कर सकती है।

 

दिग्विजय ने दिए कई मोबाइल नंबर

भोपाल। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह के दो पत्र के साथ मंगलवार को व्यापमं मामले की मूल एक्सलशीट पेनड्राइव में एसआइटी को सौंप दी गई। एक पत्र में कुछ मोबाइल नंबर देते हुए सर्विस प्रोवाइडर से कॉल डिटेल निकलवाकर जांच कराने की मांग की गई है। सिंह ने पत्र में दावा किया है कि इन नंबरों की पड़ताल से व्यापमं घोटाले में कई लोगों की संलिप्तता उजागर होगी। पत्र में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और उनसे जुड़े लोगों पर निशाना साधा गया है।

स्रोत – जागरण

 

बुधवार, 2 अप्रैल 2014

सीएपीडी के 147 कर्मचारियों की संपत्ति व बैंक खाते सील

उपभोक्ता मामले एवं जनवितरण (सीएपीडी) विभाग में आए दिन होने वाले राशन घोटालों और लंबी जांच प्रक्रिया पर कड़ा संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच ने विभाग के 147 आरोपी कर्मचारियों की संपत्ति व बैंक खाते सील करने का निर्देश दिया है। बेंच ने कहा है कि अगली सुनवाई तक ये कर्मचारी अपनी चल-अचल संपत्ति से छेड़छाड़ न करें और न ही बैंक खातों में कोई लेनदेन करें। बेंच ने इन कर्मचारियों और उनके पति-पत्नी, भाई-बहन व बच्चों के नाम चल-अचल संपत्ति व उनके बैंक खातों का ब्योरा भी मांगा है।
बेंच ने विभाग के कमिश्नर सेक्रेटरी को सभी कर्मचारियों को नोटिस जारी करने को कहा, ताकि आरोपियों की जवाबदेही तय की जा सके। बेंच ने विभाग को एक सप्ताह के भीतर इन सभी 147 कर्मचारियों व अधिकारियों के नाम समाचार पत्रों में भी प्रकाशित करने का निर्देश दिया है।
बेंच ने यह महत्वपूर्ण व दूरगामी निर्देश विभाग में जारी राशन घोटालों पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए। बेंच ने पाया कि इस जनहित याचिका में अभी तक हुई सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आए हैं कि विभाग में करोड़ों रुपये के राशन घोटाले हुए। कुछ मामलों में क्राइम ब्रांच जांच कर रही है और आरोपी सस्पेंड हैं, लेकिन सरकार ने राशन घोटाले से हुए नुकसान की वसूली करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। बेंच ने पाया कि सुनवाई के दौरान जो स्टेटस रिपोर्ट पेश हुई, उनके अनुसार कश्मीर डिवीजन में 88 कर्मचारी इन घोटालों में संलिप्त पाए गए, जबकि जम्मू डिवीजन में 57 कर्मचारियों पर राशन घोटाले का आरोप है।
बेंच ने पाया कि कश्मीर डिवीजन में अब्दुल राशिद नामक कर्मचारी पर ही 71,18,704.68 रुपये के राशन घोटाले का आरोप है। इसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया, लेकिन सरकार ने वसूली करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। बेंच ने पाया कि ऐसे दर्जनों मामले हैं। बेंच ने कहा कि यह जरूरी है कि इन आरोपियों की जवाबदेही तय की जाए और इनसे वसूली करने की दिशा में भी कदम उठाए जाएं।
साभार- जागरण

बाबू सिंह कुशवाहा की 60 करोड़ की सम्पत्ति जब्त

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाले में जेल की सलाखों के पीछे कैद बसपा सरकार के कद्दावर मंत्री और अब सपा की शरण में गए बाबू सिंह कुशवाहा को एक और तगड़ा झटका लगा है। प्रवर्तन निदेशालय (इडी) ने कुशवाहा की नकदी समेत करीब साठ करोड़ रुपये की सम्पत्ति जब्त की है। यह कार्रवाई बांदा, लखनऊ, नोएडा और दिल्ली में की गयी है। इस सम्पत्ति में करीब पांच प्रतिशत हिस्सेदारी देवरिया जिले के पूर्व विधायक राम प्रसाद जायसवाल की है। इडी अब कुशवाहा के खिलाफ मुकदमा चलायेगा।
एनआरएचएम घोटाले में कुशवाहा की गिरफ्तारी के बाद सीबीआइ की रिपोर्ट के आधार पर इडी ने वर्ष 2012 में उनके खिलाफ जांच पंजीकृत की। करीब दो साल की छानबीन के बाद इडी ने पाया कि कुशवाहा ने अपने एजेंटों, नौकरों और सहयोगियों के नाम काफी सम्पत्ति बनाई। जांच की अवधि में इडी ने दो सौ से अधिक लोगों से पूछताछ की और पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद कार्रवाई की। कुशवाहा के खिलाफ पहले चरण की बड़ी कार्रवाई करते हुए इडी ने काफी सम्पत्ति जब्त की है। इसमें कुशवाहा का बैंक में जमा 7.30 करोड़ रुपये भी है। इडी से मिली जानकारी के मुताबिक कुशवाहा की बांदा स्थित तथागत शिक्षा समिति तथा भगवत प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट के भवन जब्त किये गये हैं। राजधानी के गौरी में उनकी सात एकड़ की महंगी जमीन भी जब्त की गयी है। नोएडा में औद्योगिक क्षेत्र की जमीनों के साथ ही दिल्ली और लखनऊ के दो फ्लैट्स भी इडी ने जब्त किये हैं। लखनऊ के फ्लैट्स कालिदास मार्ग चौराहा और पार्क रोड स्थित बहुमंजिला रिहायशी अपार्टमेंट में है, जबकि दिल्ली के पॉश इलाके में भी उनका फ्लैट है। फेक नाम से बनाई गयी इन सम्पत्तियों के जब्त होने से उनके कई साझीदारों के होश उड़ गए हैं।
इडी की अदालत में चलेगा मुकदमा : बाबू सिंह कुशवाहा की जब्त की गयी सम्पत्ति का मुकदमा दिल्ली स्थित इडी की न्यायिक अथारिटी में चलेगा। इस सम्पत्ति को सही रास्ते से हासिल करने संबंधी साक्ष्य दिए जाने का कुशवाहा को मौका मिलेगा। अगर अथारिटी ने कुशवाहा के पक्ष में फैसला नहीं दिया तो यह सारी सम्पत्ति नीलाम कर दी जायेगी।
मुकद्दर ने ला दिया फिर उसी मुकाम पर
यह वक्त का तकाजा है कि बांदा के अतर्रा में लकड़ी का टाल लगाकर अपनी रोजी-रोटी शुरू करने वाले बाबू सिंह कुशवाहा का तकदीर ने साथ दिया तो वह बुलंदियों पर पहुंच गए। बसपा शासन में मिनी मुख्यमंत्री के तौर वह एक हस्ताक्षर बन गए, लेकिन एनआरएचएम घोटाले से तकदीर ने ऐसी पलटी मारी कि फिर वह उसी मुकाम पर आ गए। जिस धन और वैभव के लिए उन्होंने भ्रष्टाचार को अपनी परछाई बना लिया, अब वह भी रेत की तरह मुट्ठी से फिसलने लगा है।
इडी द्वारा साठ करोड़ की सम्पत्ति जब्त किये जाने के बाद बाबू सिंह कुशवाहा एक बार फिर सुर्खियों में हैं। कयास यही लग रहा है कि अभी उनकी बहुत सी बेनामी सम्पत्तियां जब्त होंगी। पिछले डेढ़ दशक से सुर्खियों में रहे कुशवाहा ने कभी यह सोचा भी नहीं होगा कि उन्हें ऐसे दिन देखने पड़ेंगे। कांशीराम के सम्पर्क में आने के बाद फर्श से अर्स तक पहुंचे कुशवाहा बबेरू तहसील के पखरौली गांव में कृषक परिवार से हैं। उन्होंने अतर्रा से ही हाईस्कूल व इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की। पांच भाइयों के परिवार में आर्थिक संकट देखकर बाबू सिंह ने अतर्रा में 1986 में लकड़ी का टाल खोल लिया। आइआरडी कंपोनेंट योजना के अंतर्गत बैंकों से मिलकर लोन भी कराने लगे। बसपा के कुछ नेताओं से संपर्क होने के बाद 1988 में बाबू सिंह की मुलाकात कांशीराम से हुयी। दिल्ली कार्यालय में ही बाबू सिंह को संगठन के कार्य की जिम्मेदारी दे दी गयी। यहीं से उनका राजनैतिक सफर शुरू हो गया। इसके बाद लखनऊ बसपा कार्यालय में काम किया फिर बांदा में बसपा जिलाध्यक्ष पद भी 1993 में संभाला। 1994 में ये बसपा सुप्रीमो मायावती के संपर्क में आये। काम के प्रति निष्ठा से नजदीकियां बढ़ती गयी फिर इन्हें लगातार तीन बार विधान परिषद सदस्य नामित किया गया। पहली बार 2003 में पंचायती राज मंत्री का पद मिला। दोबारा सरकार बनी तो बाबू सिंह का कद और बढ़ा दिया गया। उनके पास खनिज, नियुक्ति विभाग, सहकारिता विभाग दिये गये। इतना ही नहीं सीएम के सबसे करीबी मंत्रियों में गिनती होने के साथ अफसरों में इनका खासा रौब और दबाव था। स्कूल, कालेज, जमीन के साथ अकूत संपति बनायी है।
साभार-जागरण कॉम  

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

स्मारक घोटाला: सिद्दीकी व कुशवाहा समेत 19 पर मुकदमा

सपा सरकार ने नए साल के पहले ही दिन अपने मुख्य विपक्षी बसपा की घेरेबंदी कर दी। सूबे के बहुचर्चित स्मारक घोटाले में पिछली बसपा सरकार के कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा और चहेते अफसरों समेत 19 लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार समेत कई प्रमुख धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया है। इस मुकदमे के घेरे में कुल 199 आरोपी हैं। सतर्कता विभाग के महानिदेशक एएल बनर्जी के निर्देश पर बुधवार को देर शाम यह मुकदमा राजधानी के गोमतीनगर थाने में दर्ज किया गया।
इस मामले में वर्ष 2007 में प्रमुख पदों पर तैनात रहे तीन आइएएस अफसर तत्कालीन प्रमुख सचिव आवास और शहरी नियोजन मोहिन्दर सिंह, प्रमुख सचिव पीडब्लूडी रवीन्द्र सिंह और लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष हरभजन सिंह और तत्कालीन प्रमुख अभियंता पीडब्लूडी और अब विधायक त्रिभुवन राम भी जांच के दायरे में होंगे। विवेचना के दौरान भूमिका के आधार पर इनके खिलाफ भी कार्रवाई होगी। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 30 नवंबर को सतर्कता विभाग को लोकायुक्त जांच के दस्तावेजों का परीक्षण कर मुकदमा दर्ज कराने का आदेश दिया था।
स्मारक घोटाले के आरोपी : उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान लखनऊ सेक्टर के निरीक्षक रामनरेश सिंह राठौर की तहरीर पर लखनऊ के गोमतीनगर थाने में 19 लोगों के खिलाफ धारा 409 (अमानत में खयानत) व भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की 13 (1) डी और 13 (2) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
1- नसीमुद्दीन सिद्दीकी-पूर्व मंत्री
2. बाबू सिंह कुशवाहा-पूर्व मंत्री
3. सुहेल अहमद फारुखी-जेडी खनन
4. सीपी सिंह-पूर्व एमडी राजकीय निर्माण निगम (आरएनएन)
5.राकेश चन्द्रा-अपर परियोजना प्रबंधक आरएनएन
6. एके सक्सेना-अपर परियोजना प्रबंधक आरएनएन
7.केआर सिंह-इकाई प्रभारी, आरएनएन
8. राजीव गर्ग-स्थानिक अभियंता आरएनएन
9. एसपी गुप्ता-परियोजना प्रबंधक आरएनएन
10. पीके जैन-परियोजना प्रबंधक आरएनएन
11. एके अग्रवाल-परियोजना प्रबंधक आरएनएन
12. आरके सिंह-परियोजना प्रबंधक आरएनएन
13.बीडी त्रिपाठी-इकाई प्रभारी आरएनएन
14. मुकेश कुमार-परियोजना प्रबंधक आरएनएन
15.हीरालाल-परियोजना प्रबंधक आरएनएन
16.एसके चौबे-परियोजना प्रबंधक आरएनएन
17. एसपी सिंह-इकाई प्रभारी आरएनएन
18. एसके शुक्ला-इकाई प्रभारी आरएनएन
19. मुरली मनोहर-इकाई प्रभारी आरएनएन।
सिद्दीकी ने फैसलों का जिम्मेदार ठहराया था कैबिनेट को
इस घोटाले में फंसे पूर्व कैबिनेट मंत्री नसीमुद्दीन से ईओडब्ल्यू के अफसरों ने जब एक-एक कर कई सवाल पूछे थे तो उनका जवाब था कि स्मारकों के निर्माण का फैसला बसपा सरकार में कैबिनेट के सदस्यों ने लिया था। उन्होंने वही किया जो कैबिनेट का फैसला था। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा था कि स्मारकों के निर्माण के लिए बजट एलडीए और अन्य विभाग जो पास करके भेजते थे, उसे कैबिनेट ही पास करती थी।
अब शुरू होगी विवेचना
हमने बुधवार की शाम को मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया है। शासन की मंशा के अनुरूप यह कार्रवाई की गयी है। लोकायुक्त जांच की कुल 1200 पन्ने की रिपोर्ट के परीक्षण के बाद यह कार्रवाई की गयी है। मुकदमा दर्ज होने के बाद अब विवेचना की कार्रवाई शुरू होगी।
लखनऊ [जागरण ब्यूरो]।

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

425 करोड के घोटाले में फंसे अभिनेता बोमन ईरानी

बॉलीवुड अभिनेता बोमन ईरानी और उनका बेटा दानिश मुश्किलों में फंस गए है। बाप-बेटे पर 425 करोड के घोटाले का आरोप लगा है। इस मामले में मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा में शिकायतकर्ता गुरूप्रीत सिंह ने बोमन ईरानी और उनके बेटे दानिश पर 425 करोड के क्यूनेट घोटाले का मामला दर्ज करवाया है। वेबसाइट मनीलाइफ ने यह जानकारी दी। मामले में पूर्व बिलियर्ड चैंपियन माइकल फरेरा के खिलाफ भी केस दर्ज किया जा चुका है।
पिछले सप्ताह आर्थिक अपराध शाखा ने फरेरा और क्यू नेट के संस्थापक विजय ईश्वरन सहित 10 लोगों के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया था। जिनमें से 9 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सूत्रों के मुताबिक दानिश के क्यूनेट से जुडे बैंक अकाउंट में 81 करोड रूपए का ट्रांजेक्शन हुआ है। बोमन ईरानी पर आरोप है कि क्यूनेट के कथित 425 करोड रूपए के घोटाले को उन्होंने प्रोमोट किया और लोगों को गुमराह किया।
फरेरा एक मल्टी-लेवल मार्केटिंग कंपनी क्यूनेट के 425 करोड रूपये के घोटाले से जुडे मामले में पुलिस के सामने हाजिर होने में नाकाम रहे थे। पुलिस ने उन्हें तीन हफ्ते पहले पूछताछ के लिए बुलाया था, लेकिन वे हाजिर नहीं हुए. इससे पहले इस सिलसिले में क्यूनेट के नौ टीम लीडरों को निवेशकों को धोखा देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। क्यूनेट पर अपने मल्टी लेवल मार्केटिंग के लिए प्रतिबंधित बाइनरी पिरामिड बिजनेस मॉडल के इस्तेमाल का भी आरोप है। 8/1/2014

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शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार

संसद का बजट सत्र प्रारंभ होने के एक सप्ताह पूर्व रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार के नए प्रकरण का खुलासा हुआ है, जिससे यूपीए सरकार के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने फिनमैकानिका से 2010 में करीब 3600 करोड़ रुपए में 12 अति सुरक्षित अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टरों की ख़रीदारी की थी। इनमें से तीन हेलीकाप्टर भारत आ चुके हैं, जबकि शेष 9 जून-जुलाई तक आने वाले थे। पर अब इस भ्रष्टाचार की खबर आने पर फिलहाल भारत सरकार ने हेलीकाप्टरों की अगली खेप के भारत उतरने पर रोक लगा दी है। ज्ञात हो कि फिनमैकानिका इटली की कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड की सहयोगी कंपनी है और इसमें 30 फीसदी हिस्सेदारी इटली की सरकार की है। अति विशिष्ट व्यक्तियों के लिए खरीदे गए इन हेलीकाप्टरों के सौदे में लंबे समय से आरोप लग रहे हैं कि इसमें रिश्वत का लेन-देन हुआ है। फिनमैकानिका के मुखिया गियूसेप्पे ओरसी के ख़िलाफ़ बीते कई महीनों से जांच चल रही थी। उन पर भारतीय अधिकारियों को लगभग 3 सौ करोड़ की रिश्वत देने का आरोप है। गियूसेप्पे ओरसी को अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार के मामले में मिलान में गिरफ्तार किया गया है। भ्रष्टाचार के इस मामले में तीन अन्य लोगों को भी नजरबंद करके पूछताछ की जा रही है। माना जा रहा है कि भ्रष्टाचार के इस मामले की गूंज इटली के आम चुनावों पर भी असर दिखाएगी। इटली में संसदीय चुनाव इसी 24-25 फरवरी को होने वाले हैं। यही वजह है कि इटली के प्रधानमंत्री मारियो मोंटी ने कहा कि सरकार इस कंपनी के प्रबंधन की जांच कर रही है।
रक्षा सौदों में दलाली और रिश्वतखोरी नयी बात नहींहै। दो-दो विश्वयुध्दों के बाद जिस तरह दुनिया के विकसित देशों की तर्ज पर विकासशील और पिछड़े देशों ने रक्षा बजट को बढ़ाना शुरु किया, उसमें भ्रष्टाचार के पनपने की पूरी गुंजाइश थी। सुरक्षा कारणों से बरती जा रही गोपनीयता ने दलाली की परंपरा को विकसित किया। हथियारों के सौदागरों को विकासशील विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में अच्छा-खासा बाजार मिल गया। इन देशों में येन-केन-प्रकारेण अपने रक्षा उत्पाद बेचने की तरकीबें आयुध निर्माताओं ने अपनायी। ताजा मामले में इसी प्रवृत्ति का एक और उदाहरण हमारे सामने आया है। फिनमैकानिका के साथ जो सौदा हुआ है, उसके तार ब्रिटेन तक से जुड़े हैं। इस सौदे के एक साल बाद ही इटली की मीडिया में ऐसी रिपोटर्ें आईं कि यूरोप में दो बिचौलियों को गिरफ्तार किया गया है जिन्होंने इस सौदे को कराने में अहम भूमिका निभाई है। इसके बाद यह रक्षा सौदा भी विवादों के घेरे में आ गया और इटली में इस मामले की जांच शुरू हुई। भ्रष्टाचार की ताली एक हाथ से नहींबजी, इसमें दूसरा हाथ भारत का है। अब तक इस बात का खुलासा नहींहुआ है कि भारत में रिश्वत लेने वाला अधिकारी कौन है, लेकिन 3 सौ करोड़ रूपयों की घूस दी गई है, तो किसी के खाते में तो यह रकम गयी ही है। कुछ उंगलियां पूर्व वायुसेना प्रमुख एस पी त्यागी की ओर उठी, लेकिन उन्होंने आरोपों से साफ इन्कार करते हुए कहा कि वे 2007 में सेवानिवृत्त हो चुके थे और यह सौदा 2010 में हुआ है। इधर रक्षामंत्री ए.के.एंटनी ने दोषियों को न बख्शने की बात कही है और मामले की जांच सीबीआई के हवाले सौंप दी है। भ्रष्टाचार साबित होने पर वे सौदा रद्द होने की संभावना भी जतला रहे हैं।
 भारत सरकार को ब्रिटेन और इटली की सरकारों से न्यायिक अड़चनों के कारण उनकी जांच प्रक्रिया की जानकारी नहींदी गई है, इसलिए सीबीआई अपनी सीमित जानकारी के आधार पर ही जांच कर रही है। उसकी जांच कब तक पूरी होती है और इसमें असली दोषी कभी पकड़ में आएंगे भी या नहीं, इस बारे में फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। किंतु रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार का एक और मामला उजागर होने पर अब यह विचार किया जाना जरूरी है कि देश हित के नाम पर बरती जा रही गोपनीयता से सचमुच लाभ हो रहा है या हम दोहरा नुकसान उठा रहे हैं। एक महंगे सौदे का और दूसरा भ्रष्टाचार के बढ़ने का। आयुध या तकनीकों की खरीदी में बिचौलियो को कब तक स्थान मिलता रहेगा और विदेशी कंपनियों से अरबों का सामान खरीदने की जगह हम स्वदेशी तकनीकी को विकसित करने में अधिक से अधिक धनराशि क्यों न खर्च करें, इस पर भी विचार होना चाहिए।
(साभार-देशबन्धु )

रविवार, 2 सितंबर 2012

कोयले की कालिख

कोयले की कालिख कई दिग्गजों के चेहरे पर पुती है. सरकार चाहे एनडीए की रही हो या फिर यूपीए की, इससे कोयले की इस दलाली में सबने अपने मुंह काले किये हैं. इस काले सोने को लूटने में कोई पीछे नहीं रहा. एक वेब साईट ने जब इस पूरे मामले की पड़ताल की तो कई हैरतंगेज तथ्य सामने आये जिसमें कोयला खदानों को सिर्फ कागजों पर ही इधर उधर कर खदान हासिल करने वाली कंपनियों ने अरबों के वारे न्यारे कर लिए. यानि की कोयला खदान हासिल करने के बाद कुछ कम्पनियों ने कोयला खनन करने के बजाय मोटा मुनाफा लेकर खदानें बेच डाली. और तो और सरकार ने कोयला खदान आवंटित करते समय इन कम्पनियों के रिकॉर्ड भी नहीं देखे. अंधा बंटे रेवड़ी की तर्ज पर बंटी इन कोयला खदानों को ऐसी कम्पनियों तक को दे दिया गया जिनकी औकात सिर्फ एक लाख रुपये थी. यहाँ तक कि एक कम्पनी तो जिस दिन पंजीकृत हुई उसी दिन उसने कोयला खदान के लिए आवेदन भी कर दिया और उसे खदान भी आवंटित कर दी गई. यही नहीं आयुर्वेद दावा बनने वाली कम्पनी भी इस बंदर बाँट में हिस्सा लेने आ गई और उसे हिस्सा मिल भी गया. सीबीआई अब ये जांच कर रही है कि आखिर इस फॉर्मूले से कंपनियों को कितना फायदा हुआ. खास बात ये है कि इन कंपनियों को जरूरत से कहीं ज्यादा बड़ी कोयला खदान दी गईं. सवाल ये है कंपनियों को बैठे बिठाए मोटी कमाई करने का मौका दिया गया.
पहला राजः पुष्प स्टील और माइनिंग कंपनी
20 जुलाई 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि इस कंपनी का गठन 2 जून 2004 को हुआ. और इसी दिन दिल्ली से हजार किलोमीटर दूर कांकेर में इस कंपनी ने कच्चे लोहे की खदान के लिए आवेदन भी कर दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि ये कैसे संभव है. आवेदन में न तो तारीख लिखी गई और ना ही कंपनी से जुड़े कोई कागजात लगाए गए. जबकि नियमों के मुताबिक आवेदन करने वाली कंपनी को पिछले साल के इनकम टैक्स रिटर्न की कॉपी लगानी जरुरी है.
कोर्ट ने ये भी कहा कि आवंटन की शर्तों में साफ है कि कोयला खदान उसी कंपनी को मिलनी चाहिए जिसके पास माइनिंग का अनुभव हो. लेकिन ना तो पुष्प के पास खनन का कोई अनुभव था और ना ही कंपनी की माली हालत इतने बड़े प्रोजेक्ट के काबिल थी. आवेदन करते वक्त कंपनी का पेड अप कैपिटल सिर्फ 1 लाख रुपए था. सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कंपनी की मंशा सिर्फ आयरन और कोल ब्लॉक हासिल कर उससे मोटा मुनाफा कमाने की थी?
पुष्प स्टील ने 2004 में छत्तीसगढ़ सरकार के साथ 384 करोड़ रुपए के निवेश का करार किया. ये करार स्पांज आयरन प्लांट बनाने के लिए था. इसके लिए कंपनी ने 11 हेक्टेयर जमीन खरीदी और चीन की एक कंपनी को मशीनरी के लिए 22 लाख रुपए का एडवांस दिया. जी हां 384 करोड़ के प्लांट की मशीनरी के लिए 22 लाख रुपए का एडवांस. कंपनी का कुल निवेश 1 करोड़ 20 लाख था. लेकिन इसी आधार पर छत्तीसगढ़ सरकार ने 2005 में कंपनी को कच्चे लोहे के लिए माइनिंग लीज और प्रोस्पेक्टिव लीज दे दी.
इसके बाद कंपनी ने कोयला खदान के लिए आवेदन किया और उन्हें मध्य प्रदेश सरकार ने 2007 में 550 लाख टन कोयले वाला ब्रह्मपुरी ब्लॉक दे दिया. ये बताना जरूरी है कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश दोनों जगह बीजेपी की सरकार थी. एक ऐसी कंपनी को सैकड़ों एकड़ की खदान दे दी गई जो दरअसल छोटी सी ट्रेडिंग फर्म थी. कंपनी ने अभी तक खनन का काम शुरू भी नहीं किया है.
दूसरा राज – सवालों के घेरे में धारीवाल ग्रुप
कोयले का खेल कुछ ऐसा था कि गुटखा बनाने वाली कंपनी धारीवाल ग्रुप को भी कोयला खदान मिल गई. धारीवाल इंफ्रा नाम की कंपनी ने स्पांज आयरन प्लांट लगाने के लिए जमीन खरीदी और इसी आधार पर उसे 22 नवंबर 2008 को गोड़खरी कोयला ब्लॉक दे दिया गया. लेकिन 7 महीने के भीतर ही 240 लाख टन का ब्लॉक रखने वाली धारीवाल इंफ्रा ही बिक गई. इसे गोयनका ग्रुप की कंपनी CESC ने करीब 300 करोड़ रुपए में खरीदा. मजे की बात ये है कि CESC एक बिजली कंपनी है. यानी स्टील के लिए दी गई कोयला खदान पॉवर कंपनी के हिस्से चली गई. और सरकार तमाशा देखती रही. अपनी सफाई में धारीवाल ग्रुप ने सिर्फ इतना कहा कि माइनिंग लीज मंजूर नहीं हो पाई है और भूमि अधिग्रहण में भी दिक्कत आ रही है.
तीसरा राज – नवभारत ग्रुप
विस्फोटक बनाने वाली कंपनी जिसे 13 जनवरी 2006 को स्पांज आयरन प्लांट लगाने के लिए मदनपुर नॉर्थ कोयला खदान दे दी गई. खुद का प्लांट न होने की वजह से नवभारत ने अपनी सहयोगी कंपनी के प्लांट के आधार पर आवेदन किया था.
उस प्लांट की क्षमता सालाना 3 लाख टन स्पांज आयरन के उत्पादन की थी. यानी हर साल कंपनी को तकरीबन 5 लाख टन कोयला की जरूरत थी. लेकिन सरकार ने उसे जो खदान दी – उसमें 3 करोड़ 60 लाख टन कोयला है. कुछ साल खदान पर कुंडली मार कर बैठने के बाद नवभारत ने अपनी कंपनी का 74 फीसदी शेयर किसी और को बेच दिया. यानी पूरी कंपनी ही बेच डाली गई. यानि कोयला बेचा किसी को लेकिन गया किसी और की झोली में.
चौथा राज – फील्ड माइनिंग एंड इस्पात लिमिटेड
इस कंपनी को 8 अक्टूबर 2003 को दो कोयला खदानें – चिनोरा और वरोरा वेस्ट दी गईं. दोनों खदानों को मिलाकर कोयला उत्पादन की कुल क्षमता थी 380 लाख टन. फील्ड माइनिंग की प्रोजेक्ट रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें सालाना 2 लाख 60 हज़ार टन कोयले की जरूरत थी. इस कंपनी ने 5 साल यानी 2008 तक खदान पर कोई काम शुरू नहीं किया. उसने स्क्रीनिंग कमेटी के सामने कहा कि वो जल्द ही स्टील प्लांट खरीदने वाली है. आखिर 2010 में फील्ड माइनिंग एंड इस्पात लिमिटेड को KSK एनर्जी वेन्चर्स ने खरीद लिया. KSK वर्धा में 600 मेगावॉट का पॉवर प्लांट लगा रही है. अपनी सफाई में फील्ड माइनिंग एंड इस्पात लिमिटेड ने स्क्रीनिंग कमेटी को कहा कि उनकी कंपनी को लेकर कोर्ट का कोई फैसला आया है. इसलिए वो काम आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं.
पांचवां राज – बी एस इस्पात
बी एस इस्पात- 25 अप्रैल 2001 को विदर्भ की मरकी मंगली कोयला खदान बीएस इस्पात को दी गई. उनके पास 60 हजार टन का स्पांज आयरन प्लांट था. लेकिन उन्हें भी जरूरत से कहीं ज्यादा 343 लाख टन कोयले वाली खदान दे दी गई. उनकी जरूरत सालाना 1 लाख टन कोयला से ज्यादा नहीं थी. ये कंपनी 8 साल तक इस खदान पर यूं ही बैठी रही. 8 साल बाद कंपनी ने पर्यावारण क्लीयरेंस लेते वक्त कहा कि वो अपने प्लांट की क्षमता बढ़ाकर 1 लाख 84 हजार टन प्रति वर्ष करना चाहती है जिसके लिए उसे अब 3 लाख टन कोयले की सालाना जरुरत होगी. जानकारों का कहना है कि कंपनी ने जरूरत से कहीं बड़ी कोयला खदान पर पर्दा डालने की कोशिश में ऐसा किया था. अपनी सफाई में बी एस इस्पात ने साल 2010 में स्क्रीनिंग कमेटी को भरोसा दिलाया कि वो सितंबर 2010 तक कोयला उत्पादन शुरू कर देगी. लेकिन इसके बाद कंपनी ही बिक गई.
छठा राज – सवालों के घेरे में गोंडवाना इस्पात
बी एस इस्पात की ही एक और कंपनी गोंडवाना इस्पात को भी 2003 में माजरा ब्लॉक आवंटित किया गया. इनके प्लांट की क्षमता 1 लाख 20 हजार टन कोयले की थी लेकिन अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट में उन्होंने भी अपनी जरूरत 3 लाख टन प्रति वर्ष दिखाई. और कमाल देखिए उन्हें 315 लाख टन कोयले वाली खदान दे दी गई. यानि 100 साल तक की जरूरत आराम से पूरी. हम बता दें कि स्पॉन्ज आयरन प्लांट की औसत जिंदगी 30 साल की होती है. लेकिन अभी तक सबकुछ कागजों पर ही चल रहा था.
2008 में आकर गोंडवाना इस्पात का बी एस इस्पात में विलय हो गया. बाद में बीएस इस्पात को तीसरी कंपनी गरिमा बिल्डकॉर्प ने खरीद लिया और फिर 2011 में उसने ये कंपनी उड़ीसा सीमेंट लिमिटेड को बेच दी.
यानी न सिर्फ बी एस इस्पात ने खदान पर बैठने के बाद उसे मोटे मुनाफे में बेच दिया बल्कि खदान का एंड यूज भी बदल गया. फिर भी इन खदानों का आवंटन रद्द नहीं किया गया. आखिर क्यों? आखिर क्यों स्क्रीनिंग कमेटी और कोयला मंत्रालय सिर्फ कारण बताओ नोटिस जारी करते रहे. अपनी सफाई में गोंडवाना इस्पात ने कहा कि उनकी खदान का एक हिस्सा जंगल की जमीन पर पड़ता है इसलिए उन्हें वन विभाग की मंजूरी मिलने में दिक्कत आ रही है.
सातवां राज – सवालों के घेरे में वीरांगना स्टील कंपनी
वीरांगना स्टील कंपनी- 2005 में मरकी मंगली नंबर 2,3,4 खदानें इस कंपनी को दी गईं. इनके पास एक पुराना 60 हजार टन का स्टील प्लांट था, उसके लिए जो खदानें दी गईं उनकी क्षमता थी 190 लाख टन. फिर भी कंपनी ने पांच साल तक खनन शुरू नहीं किया. आखिरकार 2010 में कंपनी का नाम बदल कर टॉपवर्थ हो गया. इसके बाद क्रेस्ट नाम की कंपनी ने उसे खरीद लिया. यानी ये कंपनी दो बार बिक चुकी है. जाहिर है नागपुर की इस छोटी सी कंपनी की बोली इसलिए लगी क्योंकि इसके पास बड़े कोल ब्लॉक थे.
आठवां राज – सवालों के घेरे में वैद्यनाथ आयुर्वेद
आयुर्वेद उत्पाद बनाने वाली कंपनी वैद्यनाथ आयुर्वेद को भी 27 नवंबर 2003 में कोल ब्लॉक दिया गया. लेकिन 2010 तक भी ये कंपनी माइनिंग शुरू नहीं कर पाई. यहां तक कि स्क्रीनिंग कमेटी को ये कंपनी 2010 में भी ये भरोसा नहीं दिला पाई कि वो खुदाई कब शुरू करेगी और बिजली का उत्पादन कब शुरू होगा. 2011 में आकर आखिर 8 साल बाद स्क्रीनिंग कमेटी ने वैद्यनाथ को मिले कोल ब्लॉक को रद्द कर दिया. अपनी सफाई में वैद्यनाथ आयुर्वेद ने स्क्रीनिंग कमेटी को कहा कि माइनिंग प्लान को मंजूरी मिलने में देरी हो रही है क्योंकि कंपनी ने परियोजना का आकार बदल दिया है. साथ ही कंपनी में शेयर होल्डिंग पैटर्न भी बदल गया है.
उक्त आठ में से तीन मामले ऐसे हैं जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी. इसमें से दो मामले विदर्भ के हैं. इस दौरान महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी. यानी राज्य में कांग्रेस और केन्द्र में बीजेपी. ठीक वैसे ही जैसे 2004 के बाद केन्द्र में कांग्रेस और छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी की सरकार है. क्या ऐसे में दोनों पार्टियों को कोल ब्लॉक आवंटन पर राजनीति करने का अधिकार है.

साभार-मीडिया दरबार